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🛕꧁ जय माता दी 🙏 ꧂🛕 नवरात्रि के दूसरे दिन माँ दुर्गा के द्वितीय स्वरूप माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। "ब्रह्म" का अर्थ है तपस्या और "चारिणी" का अर्थ है आचरण करने वाली। अर्थात् तप का आचरण करने वाली शक्ति। माँ ब्रह्मचारिणी की कथा पूर्व जन्म में माँ ब्रह्मचारिणी ने हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था। भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए उन्होंने नारद जी के उपदेश पर अत्यधिक कठिन तपस्या की। * हजारों वर्षों की तपस्या: उन्होंने एक हज़ार वर्ष तक केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक (सब्जियों) पर निर्वाह किया। * कठिन उपवास: कुछ समय बाद उन्होंने कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। * अपर्णा नाम: कई हजार वर्षों की इस कठिन तपस्या में उन्होंने 'बिल्व पत्र' खाना भी छोड़ दिया, जिसके कारण उनका नाम 'अपर्णा' पड़ा। * ब्रह्मा जी का वरदान: उनकी इस अभूतपूर्व तपस्या को देख कर तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। अंत में पितामह ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए और कहा— "हे देवी! आज तक किसी ने ऐसी तपस्या नहीं की। तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी और भगवान शिव तुम्हें पति के रूप में प्राप्त होंगे।" देवी का स्वरूप माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत ज्योतिर्मय और भव्य है। * उनके दाहिने हाथ में जप की माला है। * बाएं हाथ में कमंडल सुशोभित है। * वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जो शांति और शुद्धता का प्रतीक है। महत्व और फल माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से भक्त के जीवन में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। कठिन संघर्षों में भी व्यक्ति का मन विचलित नहीं होता।

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