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गाँव के छोर पर एक छोटी सी झोपड़ी में एक बूढ़ी औरत रहती थी, जिसे सब 'दादी' कहते थे। दादी बहुत गरीब थीं, लेकिन उनके चेहरे पर हमेशा एक अजीब सा सुकून रहता था। एक दिन, शहर से एक अमीर आदमी, जो बहुत तनाव में था, रास्ते से गुजर रहा था। भूख लगने पर वह दादी की झोपड़ी में गया। दादी ने उसे बड़े प्यार से बाजरे की रोटी और चटनी खिलाई। रोटी खाते समय उस आदमी ने ध्यान दिया कि दादी ने तीन रोटियाँ बनाई थीं। एक रोटी उसने खा ली, एक दादी खा रही थीं, और तीसरी रोटी उन्होंने सामने एक साफ़-सुथरे कपड़े पर सलीके से रख दी थी। आस-पास और कोई था नहीं। उस आदमी ने कौतूहलवश पूछा, "दादी, आप इतनी गरीब हैं, फिर भी एक रोटी क्यों बर्बाद कर रही हैं? यहाँ तो कोई और है नहीं।" दादी धीमे से मुस्कुराईं और उन्होंने कपड़े पर रखी उस तीसरी रोटी की तरफ सम्मान से देखते हुए कहा, "बेटा, यह रोटी बर्बाद नहीं है। यह मेरे गोपाला (भगवान) के लिए है। सालों पहले जब मेरे पति और बच्चे मुझे छोड़कर चले गए, तो मैं अकेली रह गई। तब मुझे भगवान से बहुत शिकायत थी।" दादी ने अपनी बात जारी रखी, "लेकिन फिर मुझे समझ आया कि शिकायत करने से अच्छा है, उन्हें अपना साथी बना लूं। तब से मैं जब भी खाना बनाती हूँ, उनके लिए पहली रोटी निकालती हूँ और उनसे बातें करती हूँ। मुझे कभी नहीं लगा कि मैं अकेली हूँ। वह अदृश्य धागे से मुझसे बंधे हैं। जब मैं उन्हें रोटी परोसती हूँ, तो मुझे महसूस होता है कि वह मेरे सामने बैठकर खा रहे हैं और मुस्कुरा रहे हैं।" वह आदमी दादी की बात सुनकर हक्का-बक्का रह गया। उसे लगा कि यह पागलपन है, लेकिन दादी की आँखों का सुकून कुछ और ही कह रहा था। बरसों बाद, वह आदमी फिर उस गाँव से गुजरा। उसे पता चला कि दादी का कुछ समय पहले देहांत हो गया है। वह उनकी झोपड़ी में गया। झोपड़ी धूल से भरी थी, लेकिन खाना बनाने वाली जगह एकदम साफ थी। उसने देखा कि उसी कपड़े पर एक सूखी हुई, बासी रोटी रखी थी। गाँव वालों ने उसे बताया कि जिस दिन दादी शांत हुईं, उस दिन भी उन्होंने गोपाला के लिए रोटी बनाई थी। एक और बात ने उस आदमी को झकझोर दिया। दादी का शरीर तो बिस्तर पर था, लेकिन उनकी एक हथेली ऊपर की ओर खुली हुई थी, जैसे उन्होंने किसी का हाथ थाम रखा हो। और उनकी उंगलियों के बीच में एक छोटा सा, चमकदार मोर पंख फंसा हुआ था—ठीक वैसा ही जैसा कृष्ण भगवान के मुकुट में होता है। दादी के पास ऐसा कोई पंख पहले कभी नहीं देखा गया था। उस आदमी की आँखों में आँसू आ गए। वह समझ गया कि वह अदृश्य धागा टूटा नहीं था, बल्कि उसने दादी को हमेशा के लिए गोपाला से जोड़ दिया था। उसे अपनी सारी धन-दौलत फीकी लगने लगी और वह उस सुकून को पाने की राह पर चल पड़ा जो दादी को अपनी 'अदृश्य दोस्ती' से मिला था।

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Comments (3)

सविता

सविता

May 21, 2026

bahut sunder bhav bahri Katha 🌹🌹

सविता

सविता

May 21, 2026

Radhe radhe 🙏🌹 jai shree krishna ji 🙏

R k jangid 

phulera Jaipur

R k jangid phulera Jaipur

May 21, 2026

अति सुंदर जय श्री कृष्णा शुभ संध्या🌹🙏