
SHREE SHARMA
463 days ago
. “सेवा” ‘सेवा करना’ का अर्थ है ‘अनुकूल आचरण करना। हमारे सेठजी एक बड़ा ही सुन्दर दृष्टांत इस सम्बन्ध में दिया करते हैं। वे कहते हैं कि, ‘एक स्त्री थी जिसके पड़ोस में एक अन्य स्त्री रहती थी। वह स्त्री एक दिन अपनी पड़ोसिन के यहाँ गयी तो उस समय वह धान या बाजरा कूट रही थी। इसी बीच उसके पति ने बाहर से आकर आवाज दी कि दरवाजा खोलो। वह तुरन्त मूसल को हाथ से ऊपर ही छोड़कर दरवाजा खोलने दौड़ी। उसका मूसल ज्यों-का-त्यों ऊपर निराधार ही स्थिर हो गया। इस स्त्री ने देखा कि यह तो बड़ा चमत्कार है, जादू है। उसने पूछा कि, ‘मूसल कैसे ऊपर टिक गया तो उस पतिव्रता ने जवाब दिया कि, ‘पति की सेवा करती हैं। यह पति-सेवा का फल है।’ फिर उस स्त्री ने जानना चाहा कि सेवा किस प्रकार करती हो ? तो पतिव्रता स्त्री ने कहा कि, ‘सुबह-चार बजे उनके उठने के पूर्व उठती हूँ। फिर उन्हें जगाती हूँ। वे शौच जाते हैं तो मैं उनके स्नान का प्रबन्ध करती हूँ फिर उन्हें नहलाती हूँ। नहलाने के बाद उनकी पूजा का सामान रखती हूँ। वे पूजा करते हैं तो मैं खाने का सामान तैयार करती हूँ। जब वे कुछ खाकर बाहर चले जाते हैं तब मैं धान कूटती हूँ। जब वे बाहर से घूमकर आ जाते हैं तब मैं किवाड़ खोलने उठती हैं। इसी प्रकार सेवा करती हैं। इसके बाद वह स्त्री अपने घर लौट गयी। उस स्त्री ने भी इसी प्रकार अपने पति की सेवा करने का निश्चय किया। उसके पति को दमे की बीमारी थी। उसे सर्दी लगती थी और रातभर खाँसी आती थी, सुबह किसी प्रकार आँख लगती थी। वह स्त्री भी चार बजे उठकर अपने पति को उठाने लगी तो वह बोला कि ‘मैं रातभर जगा हूँ, मुझे नींद आ रही है। परन्तु पत्नी के जिद करने पर वह बेचारा उठा। स्त्री ने कहा, ‘शौच जाओ तो पति ने कहा कि अभी नहीं जाऊँगा। इस पर स्त्री बोली कि, ‘नहीं तो कहना ही नहीं है, जाना पड़ेगा क्योंकि मुझे तुम्हारी सेवा करनी है।’ बेचारा गया। फिर नहाने के लिये ठंडा पानी रखा गया तो पति ने कहा कि अभी नहीं नहायेंगे, खाँसी बढ़ जायेगी। उसकी पत्नी ने जिद किया कि नहाना पड़ेगा क्योंकि मुझे तुम्हारी सेवा करनी है। बेचारा काँपते-काँपते नहाया। इसके बाद पूजा के लिये कहा गया परन्तु वह कभी पूजा करता नहीं था फिर भी पत्नी के कहने पर पूजा के लिये बैठ गया। इसके बाद भोजन करने को कहा गया तो पति ने कहा–‘अभी मुझे भूख नहीं है, खाऊँगा तो मेरी बीमारी बढ़ जायेगी, दमा बढ़ जायेगा।’ उसकी स्त्री बोली–‘खाना पड़ेगा, मुझे तुम्हारी सेवा जो करनी है। उसने खा लिया तो उसकी स्त्री ने कहा कि, ‘अब बाहर जाकर घूम आओ।’ उसने प्रतिवाद किया कि मैं क्यों बाहर जाऊँ ? इस पर स्त्री ने कहा कि जाना तो पड़ेगा ही क्योंकि मुझे तुम्हारी सेवा जो करनी है। बेचारा बाहर गया तो इसने मूसल लेकर धान कूटना प्रारम्भ किया। उसके वापस आकर पुकारने पर यह स्त्री भी जब ज्यों-का-त्यों छोड़कर चलने लगी तो मूसल उसके हाथ पर गिर पड़ा और हाथ टूट गया। इसके बाद वह अपने पड़ोसिन के यहाँ गाली बकती हुई गयी और कहा कि, ‘जैसे तूने बताया था वैसी ही सेवा मैंने की और यह मेरा हाथ टूट गया। ऐसा क्यों ?’ पड़ोसिन ने कहा कि, ‘भलेमानस ! क्या यह सेवा हुई ? तुम्हारे पति जिस बात से प्रसन्न हों, जिसमें उनका हित हो, जिससे उनको सुख पहुँचता हो वह कार्य सेवा है अन्य कोई भी कार्य सेवा नहीं है। सेवा का अर्थ है अनुकूल आचरण करना।' ० ० ० – श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार (श्रीभाईजी) ‘सरस प्रसंग’ ॥जय श्री राधे कृष्ण ॥ ********************************************
Comments (2)

mymandir Team
May 25, 2025
sudar story

Rama Devi Sahu
May 25, 2025
Radhey Radhey ❤️ Jii 🙏🌹🌹
