
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
204 days ago
*अमृत कथा* *🙏जब धर्म की मर्यादा बचाने के लिए स्वयं भगवान ने रची माया🙏* 🌺🌱🌺🌱🌺🌱🌺🌱🌺🌱🌺 ब्रह्मा सृष्टि के जनक हैं, महादेव संहार के अधिपति, और इस जगत के संतुलन का भार जिन पर है—वे हैं श्रीहरि विष्णु। जब-जब अधर्म ने सीमा लांघी और भक्तों पर संकट आया, तब-तब विष्णु ने केवल शस्त्र नहीं उठाए, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर माया और चतुराई का भी सहारा लिया। ये वे लीला-क्षण हैं, जिन्हें लोग “छल” कहते हैं, पर वास्तव में वे धर्म की रक्षा के उपाय थे। आइए जानते हैं ऐसे ही पाँच प्रसंग, जहाँ श्रीहरि की माया से संसार सुरक्षित रहा— *१ भस्मासुर का विनाश:-* शिवजी से वरदान पाकर भस्मासुर स्वयं उन्हीं के प्राणों का शत्रु बन बैठा। तब विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया। नृत्य की लीला में उलझाकर उन्होंने भस्मासुर से वही करवाया, जो उसके अंत का कारण बना—उसका हाथ उसके ही सिर पर। *२ वृंदा–जलंधर प्रसंग:-* जलंधर की अपराजेयता उसकी पत्नी वृंदा के सतीत्व से जुड़ी थी। देवताओं की रक्षा हेतु विष्णु ने जलंधर का रूप लिया, जिससे वृंदा का सतीत्व भंग हुआ और अधर्म का अंत संभव हो सका। इस लीला के परिणामस्वरूप वृंदा तुलसी बनीं और विष्णु शालिग्राम—भक्ति का अमर प्रतीक। *३ समुद्र मंथन और अमृत :-* अमृत हाथ लगते ही दैत्यों का अहंकार जाग उठा। तब विष्णु ने फिर मोहिनी रूप लिया। सौंदर्य की माया में बंधे दैत्य देखते ही रह गए और अमृत देवताओं तक पहुँच गया—स्वर्ग की रक्षा हो गई। *४ वामन लीला और राजा बलि :-* दानवीर बलि जब अहंकार में डूबने लगे, तब विष्णु वामन बनकर आए। तीन पग भूमि माँगी—दो पग में पूरा ब्रह्मांड नाप लिया और तीसरा पग बलि के सिर पर रखकर उसे पाताल भेजा। पर धर्म का सम्मान देखिए—विष्णु स्वयं बलि के द्वारपाल बने। *५ बद्रीनाथ धाम की कथा:-* जहाँ कभी शिव–पार्वती का निवास था, वही स्थान विष्णु को प्रिय लगा। एक रोते बालक का रूप धरकर उन्होंने ऐसी लीला रची कि वह धाम उनके तप का केंद्र बन गया और शिवजी केदारनाथ पधारे। *सारांश:-* ईश्वर की हर लीला, चाहे वह मानव दृष्टि में “छल” क्यों न लगे, उसका उद्देश्य सदैव लोक-कल्याण, भक्त-रक्षा और धर्म-स्थापना ही होता है। 🌺🙏🌺जय श्री राधे 🌺🙏🌺
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