
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
162 days ago
गणगौर का पर्व राजस्थान और उत्तर भारत के कई हिस्सों में अखंड सौभाग्य, प्रेम और सुखी वैवाहिक जीवन का प्रतीक माना जाता है। यह कथा भगवान शिव (ईसर जी) और माता पार्वती (गौरा जी) के अनन्य प्रेम और आशीर्वाद को दर्शाती है। यहाँ गणगौर व्रत की प्रचलित पौराणिक कथा दी गई है: गणगौर की पौराणिक कथा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती, नारद मुनी के साथ भ्रमण पर निकले। चलते-चलते वे एक गांव में पहुँचे। जब गांव वालों को पता चला कि साक्षात महादेव और माँ पार्वती आए हैं, तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। 1. निर्धन महिलाओं का समर्पण गांव की निर्धन परिवारों की स्त्रियां, जो सच्ची श्रद्धा रखती थीं, उनके पास भोग लगाने के लिए थाल सजाने का समय नहीं था। वे तुरंत जो भी फल, फूल और जल उपलब्ध था, उसे लेकर भगवान के पास पहुँच गईं। उनकी भक्ति और सादगी से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने अपने हाथों से उन पर सुहाग रस छिड़क दिया और उन्हें अखंड सौभाग्य का वरदान दिया। 2. कुलीन महिलाओं का आगमन थोड़ी देर बाद गांव की कुलीन (धनी) महिलाएं तरह-तरह के पकवान और सोने-चांदी के थालों में छप्पन भोग सजाकर आईं। उन्हें देखकर भगवान शिव ने पार्वती जी से पूछा— "देवी! आपने सारा सुहाग रस तो पहले ही निर्धन महिलाओं को दे दिया, अब इन्हें आप क्या देंगी?" 3. माता पार्वती का आशीर्वाद माता पार्वती ने मुस्कुराते हुए कहा— "प्रभु, उन महिलाओं को तो केवल ऊपरी रस मिला है। लेकिन इन कुलीन महिलाओं को मैं अपनी अनामिका उंगली चीरकर अपने रक्त का सुहाग रस दूंगी।" माता ने वैसा ही किया। उन्होंने अपनी उंगली से रक्त की बूंदें उन पर छिड़कीं, जो उनके सौभाग्य का अटूट प्रतीक बन गईं। 4. व्रत की परंपरा इसके बाद माता पार्वती ने नदी के तट पर जाकर बालू (मिट्टी) से महादेव की मूर्ति बनाई और उनका पूजन किया। उन्होंने भोग लगाया और स्वयं प्रसादी ग्रहण की। तभी महादेव ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि जो भी स्त्री इस दिन श्रद्धापूर्वक तुम्हारा और मेरा पूजन करेगी, उसका सुहाग अमर रहेगा। गणगौर व्रत के मुख्य बिंदु * चैत्र शुक्ल तृतीया: यह पर्व मुख्य रूप से चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। * ईसर-गौरा: इस दिन ईसर जी (शिव) और गौर जी (पार्वती) की मिट्टी की मूर्तियों की पूजा होती है। * सोलह दिन का व्रत: विवाहित महिलाएं और कुंवारी कन्याएं होली के अगले दिन (धुलंडी) से ही पूजा शुरू कर देती हैं, जो 16 दिनों तक चलती है। * प्रतीक: यह पर्व पति-पत्नी के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। > विशेष नोट: गणगौर पूजन के समय महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और मेहंदी लगाती हैं, जो इस उत्सव की रौनक और बढ़ा देते हैं। >
Comments (2)

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
Mar 21, 2026
जय भोले नाथ 🙏 जय माता दी 🙏 बेहना जी

Riya Riya 💖💖
Mar 21, 2026
🙏🕉️Har Har Mahadev 🕉️🙏 Jai Mata Parwati 🙏🌹 Subha Sandhya Vandan Bhaiya Jii 🙏🙏
