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29.5.2026 आजकल कुछ बच्चे 20/25 वर्ष की आयु में थोड़ा सा पढ़ लिखकर इतने अभिमानी हो जाते हैं, कि वे किसी का कोई मूल्य ही नहीं समझते। कोई कोई तो अपने माता-पिता को यहां तक भी कह देते हैं, कि *"आपने हमारे लिए किया ही क्या है?"* ऐसे मूर्ख बच्चों के प्रश्न का मेरी ओर से यह उत्तर है, कि *"यदि आपके माता-पिता ने आपके बचपन में आपकी सेवा न की होती, तो आज आप जीवित भी नहीं होते। आप को तो उनका बहुत उपकार मानना चाहिए, कि उनकी सेवाओं के कारण ही आप आज जीवित हैं। और जो कुछ भी आपने पढ़ा लिखा है, वह सब उन्हीं के कारण से है। उन्हीं के कारण आप खा पीकर इतने बड़े हुए। पढ़ लिख कर विद्वान बने। आपके माता-पिता के तो आपके ऊपर इतने उपकार हैं, कि आप उनका ऋण जीवन भर भी नहीं उतार पाएंगे। इसलिए ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें न करें। बल्कि उनके त्याग और तपस्या को समझें। उनके प्रति कृतज्ञ होवें।"* आपके जीवन में कितनी ही समस्याएं आई होंगी, आपकी माता जी ने आपकी सब समस्याओं को सुलझाया। आपकी पढ़ाई- लिखाई और उन्नति के लिए आपके पिताजी ने अपनी बहुत सी संपत्ति दांव पर लगा दी। आपके माता-पिता ने अपने सुख छोड़कर आपकी सुख सुविधाओं को प्राथमिकता दी। फिर भी आप कहते हैं कि *"आपने हमारे लिए किया ही क्या है?" "ऐसा कहते हुए तो आपको शर्म आनी चाहिए। कुछ तो सभ्यता से बात करें।"* *"आपकी माताजी ने वर्षों तक आपको खिलाया पिलाया, पाल-पोस कर बड़ा किया। आपके कपड़े धोए, बर्तन मांजे। और भी न जाने क्या-क्या किया, और सब प्रकार से आपकी रक्षा की। कितनी ही बार आप रोगी हो गए। तब आप की मां ने जो रात रात भर जाग कर, जितने प्रेम से आपकी सेवा की, शायद दुनिया में और कोई नहीं कर पाएगा। आपके पिता जी ने आपको कितनी ही बार चोट खाने और मरने से बचाया। आपको उठना बैठना चलना फिरना खाना पीना पढ़ना लिखना आदि कुछ भी नहीं आता था, सब कुछ माता-पिता ने सिखाया। लाखों रुपया और शायद 1 या 2 करोड़ रुपए तक भी आपके लिए खर्च किये होंगे। आपके भविष्य को सुधारने तथा आपको योग्य बनाने के लिए आपके पिताजी ने तन मन धन आदि सब कुछ दांव पर लगा दिया। आपको कितने ही प्रकार के सुझाव दिए। आपकी मूर्खता और अज्ञानता के कारण आप न जाने कितनी ही बार दुर्घटनाओं की चपेट में आ सकते थे, और मर भी सकते थे। आपको उन्होंने उन सब संभावित दुर्घटनाओं में मरने से बचाया। इसलिए उनके उपकारों को समझें और मूर्खता भरी बातें न करें। बल्कि उनका सम्मान करें।"* कुछ समय बाद वे वृद्ध हो जाएंगे। अब आपका कर्तव्य तो यह बनता है, कि *"अब आप उनकी वृद्धावस्था में, पूरी श्रद्धा से उनकी सेवा करें, जैसे उन्होंने आपके बचपन में आपकी सेवा की थी। यदि आप ऐसा करेंगे, तो ही आप मनुष्य कहलाने के अधिकारी होंगे। पढ़ने लिखने का यही फल है, कि आप एक अच्छे मनुष्य बन कर अपने माता-पिता की वृद्धावस्था में उनकी सेवा करें।" "अन्यथा अपने जीवन में आप कितना ही धन कमा लें, कितनी ही गाड़ी बंगला खरीद लें, वह सब कुछ व्यर्थ है। यदि आपने अपने माता-पिता की वृद्धावस्था में सेवा नहीं की तो।"* जब आप स्वयं मां-बाप बन जाओगे, और अपने बच्चों के लिए कुछ करोगे, *"तब आपको समझ में आएगा, कि आपके माता-पिता ने आपके लिए क्या किया है?"* *"इसलिए अपने माता-पिता एवं गुरुजनों आदि बड़े बुजुर्गों के साथ सभ्यता एवं नम्रता से व्यवहार करें। उनके साथ मूर्खता असभ्यता और दुष्टाचार का कोई भी व्यवहार न करें।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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