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यह प्रसंग स्वामी विवेकानंद के जीवन की एक अत्यंत प्रेरक घटना है, जिसे अक्सर गुरु-भक्ति और कर्तव्यनिष्ठा के उदाहरण के रूप में सुनाया जाता है। यह कहानी स्वामी विवेकानंद के शिष्य शरद चंद्र चक्रवर्ती (जो बाद में स्वामी सारदानंद के नाम से जाने गए) या कुछ स्थानों पर उनके अन्य शिष्यों के संदर्भ में भी सुनी जाती है, लेकिन इसका मूल संदेश अटूट श्रद्धा है। घटना का सारांश एक बार भारी बारिश हो रही थी और मठ के पास के खेत की मेड़ (सीमा) टूट गई थी, जिससे सारा पानी बाहर बह रहा था। गुरु जी (स्वामी विवेकानंद) ने अपने शिष्य को उसे ठीक करने के लिए भेजा। * शिष्य का प्रयास: शिष्य ने बहुत कोशिश की, मिट्टी डाली, पत्थर रखे, लेकिन पानी का बहाव इतना तेज था कि मेड़ टिक ही नहीं रही थी। * समर्पण: जब कोई रास्ता नहीं सूझा, तो शिष्य ने सोचा कि गुरु की आज्ञा का पालन हर हाल में होना चाहिए। वह स्वयं उस टूटी हुई मेड़ की जगह लेट गया। उसके शरीर से पानी का बहाव रुक गया। * पूरी रात का संघर्ष: वह पूरी रात कड़ाके की ठंड और पानी के बीच वहीं लेटा रहा। शरीर ठंड से कांप रहा था, लेकिन मन में सिर्फ गुरु की आज्ञा थी। * सुबह का दृश्य: सुबह जब गुरु जी ने देखा कि शिष्य वापस नहीं आया, तो वे उसे ढूंढते हुए खेत पहुँचे। उन्होंने आवाज़ लगाई, तब शिष्य की कांपती हुई आवाज़ आई। गुरु जी ने जब उसे इस अवस्था में देखा, तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। इस प्रसंग की सीख प्रेमानन्द महाराज जी भी अक्सर ऐसी कथाओं के माध्यम से बताते हैं कि "आज्ञा पालन" ही भक्ति की पहली सीढ़ी है। * गुरु-निष्ठा: जब तर्क काम करना बंद कर दे, वहां विश्वास काम आता है। * तपस्या: शरीर के सुख को त्याग कर कर्तव्य को सर्वोपरि रखना ही वास्तविक साधना है। * अनन्य भक्ति: शिष्य ने खुद को 'मिट्टी' बना लिया ताकि गुरु का संकल्प पूरा हो सके। महाराज जी कहते हैं कि यदि हमारे भीतर भी अपने इष्ट या गुरु के प्रति ऐसी निष्ठा आ जाए, तो परमात्मा को पाने में देर नहीं लगती।

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