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14.6.2026 संसार में सब प्रकार के लोग होते हैं। कुछ परोपकारी स्वभाव के होते हैं, और कुछ स्वार्थी टाइप के होते हैं। *"तो मनुष्य कहलाने का अधिकारी वही व्यक्ति है, जिसमें मनुष्यता हो।"* मनुष्यता के कुछ मोटे-मोटे लक्षण इस प्रकार से हैं। *"दूसरों को लाभ पहुंचाना, उनकी सेवा करना आदि यह मनुष्यता का लक्षण है।"* यदि आप किसी को लाभ पहुंचा सकते हैं, तो बहुत अच्छा। *"यदि आप किसी को लाभ नहीं पहुंचा सकते तो कोई बात नहीं, किसी की हानि तो न ही करें। किसी की व्यर्थ में हानि करना, यह मनुष्यता नहीं है।"* ऐसे ही दूसरों को सुख देना चाहिए। *"यदि आप सुख नहीं दे सकते, तो कोई बात नहीं, कम से कम दूसरों को दुख भी न दें। यदि किसी की प्रशंसा नहीं कर सकते, तो कम से कम उसकी बुराई भी न करें। यदि आप इतना भी कर लेंगे, तो भी मनुष्यता की सीमा के अंतर्गत रहेंगे।"* *"दूसरों को दुख देना, दूसरों की बुराइयां करना, किसी की निंदा चुगली करना, प्रेम से रह रहे दो लोगों में लड़ाई झगड़ा करवा देना, ऐसे काम तो मनुष्यता से बाहर हैं।"* अब दोनों बातें आपके सामने हैं। *"यदि आप मनुष्य कहलाना चाहते हों, तो ऊपर बताई बातों पर मनन करें, और मनुष्यता वाले कार्य ही करें। तभी आप मनुष्य कहलाएंगे, अन्यथा नहीं।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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