
SHREE SHARMA
20 days ago
सतयुग का आरंभिक काल था। सृष्टि अभी नई-नई बनी थी। चारों ओर दिव्यता, शांति और धर्म का प्रकाश फैला हुआ था। ब्रह्मा जी अपनी रचना के कार्य में निरंतर लगे रहते थे और देवता भी समय-समय पर उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करते थे। एक दिन ब्रह्मा जी, इंद्र तथा अन्य देवताओं के साथ भगवान शिव से मिलने कैलाश पर्वत पहुँचे। उस समय भगवान शिव समाधि में थे और उनके द्वार पर श्रीगणेश तथा भगवान कार्तिकेय सभी अतिथियों का आदरपूर्वक स्वागत कर रहे थे। जैसे ही ब्रह्मा जी निकट आए, भगवान कार्तिकेय ने दोनों हाथ जोड़कर विनम्रता से कहा, "सृष्टि के रचयिता ब्रह्मदेव को मेरा सादर प्रणाम।" लेकिन ब्रह्मा जी बिना कोई उत्तर दिए सीधे आगे बढ़ गए। उनके मुख पर गंभीरता थी और उन्होंने कार्तिकेय की ओर देखा तक नहीं। कार्तिकेय ने आश्चर्य से गणेश जी की ओर देखा। उन्होंने धीमे स्वर में कहा, "भ्राता, हमने ब्रह्मा जी का सम्मान किया, फिर भी उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया।" श्रीगणेश मुस्कुराकर बोले, "अनुज, संभव है वे किसी गहन चिंतन में हों। हमें इस बात को मन पर नहीं लेना चाहिए।" लेकिन कार्तिकेय का मन शांत नहीं हुआ। वे बोले, "नहीं भ्राता। सम्मान का उत्तर देना भी धर्म है। यदि स्वयं सृष्टि के रचयिता ही मर्यादा का पालन न करें तो संसार क्या सीखेगा?" यह कहकर वे सीधे ब्रह्मा जी के पास पहुँच गए। देवताओं के बीच बैठे ब्रह्मा जी से कार्तिकेय ने शांत स्वर में पूछा, "ब्रह्मदेव, मैंने आपको प्रणाम किया था। आपने उसका उत्तर क्यों नहीं दिया?" ब्रह्मा जी ने सहज भाव से कहा, "कुमार, मेरा ध्यान कहीं और था। मैंने तुम्हें देखा ही नहीं।" कार्तिकेय ने तुरंत दूसरा प्रश्न किया, "यदि आपका ध्यान इतना विचलित था तो बताइए, आपका कार्य क्या है?" ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया, "मैं इस सृष्टि का रचयिता हूँ। समस्त जीवों की उत्पत्ति और सृष्टि की व्यवस्था का निर्माण मेरा कार्य है।" कार्तिकेय ने आगे पूछा, "जब आप सृष्टि की रचना करते हैं तो उसका आधार क्या होता है?" ब्रह्मा जी बोले, "चारों वेद मेरे ज्ञान का आधार हैं। उन्हीं के अनुसार मैं सृष्टि की रचना करता हूँ।" कार्तिकेय ने फिर प्रश्न किया, "वेदों का मूल क्या है?" ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया, "ओम्। समस्त वेद उसी से उत्पन्न हुए हैं।" कार्तिकेय ने मुस्कुराते हुए अगला प्रश्न किया, "यदि ऐसा है तो कृपया बताइए, 'ओम्' का वास्तविक तात्त्विक अर्थ क्या है? केवल उसके अक्षरों का नहीं, उसके परम रहस्य का वर्णन कीजिए।" यह सुनकर ब्रह्मा जी कुछ क्षण मौन हो गए। उन्होंने 'अ', 'उ' और 'म' का सामान्य अर्थ तो बताया, लेकिन उसके आध्यात्मिक और परम तत्त्व का उत्तर नहीं दे सके। कार्तिकेय ने एक के बाद एक अनेक प्रश्न किए, परंतु ब्रह्मा जी किसी का भी संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए। धीरे-धीरे देवताओं के बीच भी सन्नाटा छा गया। तब भगवान कार्तिकेय का स्वर गंभीर हो उठा। उन्होंने कहा, "ब्रह्मदेव, आप सृष्टि के रचयिता हैं, लेकिन यदि आपको स्वयं 'ओम्' का तात्त्विक ज्ञान ही नहीं है, तो सृष्टि की रचना का अधिकार आपको कैसे प्राप्त हो सकता है? ज्ञान के बिना अधिकार केवल अहंकार को जन्म देता है।" यह कहकर कार्तिकेय ने घोषणा की, "आज से मैं आपको सृष्टि रचना के कार्य से विराम देता हूँ। जब तक आप परम ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक आप इस कार्य के अधिकारी नहीं हैं।" इतना कहकर उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से ब्रह्मा जी को बंदी बना लिया। देवताओं के लिए यह दृश्य अत्यंत आश्चर्यजनक था। सृष्टि के रचयिता स्वयं कारागार में थे। उनके बंदी होते ही सृष्टि की रचना रुक गई। नए जीवों का जन्म बंद हो गया। ब्रह्मांड की व्यवस्था धीरे-धीरे प्रभावित होने लगी। देवता चिंतित होकर उपाय सोचने लगे। इसी बीच भगवान शिव समाधि से बाहर आए। उन्होंने देवताओं के मुख पर चिंता देखी और कारण पूछा। इंद्र ने हाथ जोड़कर पूरी घटना सुना दी। भगवान शिव तुरंत कार्तिकेय के पास पहुँचे और शांत स्वर में बोले, "पुत्र, तुमने ब्रह्मा जी को बंदी क्यों बनाया?" कार्तिकेय ने विनम्रता से उत्तर दिया, "प्रभु, जो स्वयं 'ओम्' के परम रहस्य को नहीं जानता, वह सृष्टि की रचना का अधिकारी नहीं हो सकता। ज्ञान से पहले पद का अहंकार विनाश का कारण बनता है।" भगवान शिव ने मुस्कुराकर पूछा, "तो क्या तुम्हें 'ओम्' का वास्तविक अर्थ ज्ञात है?" कार्तिकेय ने उत्तर दिया, "हाँ प्रभु, लेकिन यह ज्ञान केवल गुरु से शिष्य को दिया जाता है। यदि आप इसे सुनना चाहते हैं तो आपको शिष्य भाव धारण करना होगा।" भगवान शिव ने तुरं

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