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SHREE SHARMA

442 days ago

*भगवान सूर्यनारायण की द्वादश मूर्ति (द्वादश आदित्य)* इन्द्र, धाता, पर्जन्य, त्वष्टा, पूषा, अर्यमा, भग, विवस्वान्, विष्णु, अंश, वरुण तथा मित्र रूपी द्वादश मूर्ति द्वारा परमात्मा सूर्यदेव ही जगत् में व्याप्त होकर विराजमान हैं। इन्द्रो धाताथ पर्जन्यस्त्वष्टा पूषार्य्यमा भगः। विवस्वान् विष्णुरंशश्च वरुणो मित्र एव च॥ आभिर्द्वादशभिस्तेन सूर्य्येण परमात्मना। कृत्स्नं जगदिदं व्याप्तं मूर्तिभिश्च द्विजोत्तमाः॥ - श्रीब्रह्ममहापुराण *प्रथम मूर्ति इंद्र* इन आदित्य की जो इन्द्र नामक प्रथम मूर्ति है, वे ही देवताओं के शत्रुओं का वध करके देवराजत्व रूप में विराजमान हैं। तस्य यां प्रथमा मूर्तिरादित्यस्येन्द्रसंज्ञिता । स्थिता सा देवराजत्वे देवानां रिपुनाशिनी ॥ *द्वितीय मूर्ति प्रजापति* उनकी द्वितीय मूर्ति धाता प्रजापतिरूपेण स्थापित होकर विविध प्रजा सृजन करती है। द्वितीया तस्य या मूर्ति र्नाम्ना धातेति कीर्तिता । स्थिता प्रजापतित्वेन विविधाः सृजते प्रजाः॥ *तृतीय मूर्ति पर्जन्य* उनकी तृतीय मूर्ति है प्रसिद्ध पर्जन्य। यह मेघरूपिणी होकर वारिधारा की वर्षा करती है। तृतीयार्कस्य या मूर्तिः पर्जन्य इति विश्रुता। मेघेष्वेव स्थिता सा तु वर्षते च गभस्तिभिः॥ *चतुर्थ मूर्ति त्वष्टा* उनकी त्वष्टा नामक चतुर्थ मूर्ति वनस्पति तथा औषधि (अन्न) में विराजित है। चतुर्थी तस्य या मूर्तिर्नाम्ना त्वष्टेति विश्रुता। स्थिता वनस्पतौ सा तु ओषधीषु च सर्व्वतः॥ *पंचम मूर्ति पूषा* पंचमी पूषामूर्ति अत्र में स्थापित होकर सदा प्रजाओं का पोषण करती रहती है। पञ्चमी तस्य या मूर्तिर्नाम्ना पूषेति विश्रुता। अन्ने व्यवस्थिता सा तु प्रजां पुष्णाति नित्यशः॥॥ *षष्ठी मूर्ति पूषा* इनकी अर्यमा नामक षष्ठ मूर्ति वायु के आकार में संचरण करती देवदेह का आश्रय लेती है। मूर्तिः षष्ठी रवेर्या अर्य्यमा इति विश्रुता। वायोः संसरणा सा तु देवेष्वेव समाश्रिता॥ *सप्तम मूर्ति पूषा* सूर्य की भानु नामक सप्तम मूर्ति भूतल पर तथा देहधारियों के देह में विराजित रहती है। भानोर्या सप्तमी मूर्तिर्नाम्ना भगेति विश्रुता। भूतिष्ववस्थिता सा तु शरीरेषु च देहिनाम्॥ *अष्टम् मूर्ति विवस्वान्* विवस्वान् नामक अष्टम मूर्ति अग्नि में प्रतिष्ठापित होकर देहधारियों द्वारा खाये अन्न का पाक करती है। मूर्ति र्या त्वष्टमी तस्य विवस्वानिति विश्रुता । अग्नौ प्रतिष्ठिता सा तु पचत्यन्नं शरीरिणाम् ॥ *नवम मूर्ति विष्णु* विष्णु नामक नवम मूर्ति देवगण के शत्रु हननार्थ नित्य प्रादुर्भूत होती है। नवमी चित्रभानोर्या मूर्ति र्विष्णुश्च नामतः। प्रादुर्भवति सा नित्यं देवनामरिसूदनी॥ *दशम मूर्ति अंशुमान* अंशुमान नामक दशम मूर्ति वायु में स्थित प्रजाओं को आह्लादित करती है। दशमी तस्य या मूर्ति रंशुमानिति विश्रुता । वायौ प्रतिष्ठिता सा तु प्रह्लादयति वै प्रजाः॥ *एकादश मूर्ति वरुण* सूर्य की वरुण नामक ग्यारहवीं मूर्ति जल में रहकर नित्य प्रजापोषण करती है। मूर्ति स्त्वेकादशी भानोर्नाम्ना वरुणसंज्ञिता। जलेष्ववस्थिता सा तु प्रजां पुष्णाति नित्यशः॥ *द्वादश मूर्ति मित्र* इनकी मित्र नामक द्वादश मूर्ति लोकहितार्थ चन्द्रसरिता तट पर अवस्थान करती है। मूर्ति र्या द्वादशी भानोर्नाम्ना मित्रेति संज्ञिता। लोकानां सा हितार्थाय स्थिता चन्द्रसरित्तटे॥ परमात्मा सविता इन द्वादश मूर्ति यों द्वारा समस्त जगत् को व्याप्त करके विराजित हैं। तभी नित्य भक्तिशाली मनुष्य बारह आदित्यों का ध्यान एवं नमस्कार प्रणाम करके उनका द्वादश नाम सुनना अथवा पाठ करना चाहिए। आभिर्द्वादशभिस्तेन सवित्रा परमात्मना। कृत्स्नं जगदिदं व्याप्तं मूर्ति भिश्च द्विजोत्तमाः॥ - इतिश्रीब्रह्ममहापुराणे --

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