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14.7.2026 आजकल ऐसा देखा जता है, कि *"बहुत से लोग बड़े स्वार्थी होते हैं। वे सब तरफ से केवल अपना स्वार्थ ही सिद्ध करते रहते हैं। यह तो पशु पक्षियों का स्वभाव है, मनुष्यों का नहीं।"* मनुष्य तो उस कहते हैं, *"जो अपने सुख दुख के समान दूसरों का सुख दुख समझे। अर्थात जैसे वह अपना दुख दूर करना चाहता है, ऐसे ही दूसरों का भी दुख दूर करे। जैसे अपने लिए सुख प्राप्त करना चाहता है, ऐसे ही दूसरों को भी सुख दे।"* बस, यही परिभाषा महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने अपने सत्यार्थ प्रकाश आदि ग्रंथों में दी है। *"जीवन क्षण भंगुर है। कल तक हम रहेेंगे या नहीं रहेेंगे, इस बात की कोई गारंटी नहीं है।"* रात को सोकर सुबह जब उठते हैं, तो ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए, कि उसने हमें एक नया जीवन फिर से दिया है। *"क्योंकि सोया हुआ व्यक्ति लगभग मरे हुए व्यक्ति के समान ही होता है। उन दोनों में केवल इतना ही अंतर होता है कि सोए हुए व्यक्ति की सांस चलती रहती है, और मरे हुए की सांस नहीं चलती। बाकी दुनियां से बेखबर तो दोनों ही होते हैं।"* अतः सुबह उठकर प्रतिदिन ईश्वर को धन्यवाद अवश्य देवें कि *"हे ईश्वर! आपकी कृपा से आज की रात्रि बहुत अच्छी बीती। आपने अभी सुबह जगा कर हमें एक नया जीवन प्रदान किया है, हम आपका बहुत धन्यवाद करते हैं।"* और आप से प्रार्थना करते हैं, कि *"आप हमें ऐसी विद्या बुद्धि शक्ति दीजिए कि हम आज का दिन मनुष्य बनकर जीएं। केवल स्वार्थी न बनें। दूसरों को भी सुख दें। इससे आपकी कृपा से हमें बहुत सा पुण्य प्राप्त होगा। यदि हम इस प्रकार से कुछ पुण्य कमा लेंगे, तो हमारा यह जीवन भी सार्थक होगा, और अगला जन्म भी आपकी कृपा से अच्छा मिल जाएगा।"* *"फिर दिन भर इस प्रार्थना के अनुसार जीवन जीएं। अपने सुख के लिए तो सब लोग काम करते ही हैं। दूसरों के सुख के लिए भी कुछ काम करें। इसी में जीवन का आनन्द है, और इसी का नाम मनुष्यता है।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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