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बचपन में जब होलिका दहन के लिए लकड़ियाँ जुटाते थे. बचपन की यादें. होली उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई 🌷💐🪷🌸 आपको होली की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🌷✨ बचपन की वो होली वाकई में कुछ अलग ही होती थी। जब त्योहार आने से हफ़्तों पहले ही "मिशन होलिका दहन" शुरू हो जाता था। वह यादें आज भी चेहरे पर मुस्कान ले आती हैं। वो बचपन के दिन और होलिका दहन की तैयारी: * लकड़ियों की 'चोरी' और छिनता-झपटी: मोहल्ले के लड़कों की टोली बनाकर यहाँ-वहाँ से लकड़ियाँ, पुराने कंडे (उपले) और सूखी टहनियाँ इकट्ठा करना। कभी-कभी तो किसी के घर के बाहर रखी लकड़ी उठाने पर जो डांट पड़ती थी, उसका मज़ा ही कुछ और था। * प्रतिस्पर्धा का भाव: अक्सर मोहल्ले के दो चौराहों के बीच कॉम्पिटिशन होता था कि "किसकी होली सबसे ऊँची बनेगी?" हम अपनी ढेरी को बड़ा दिखाने के लिए दिन-रात एक कर देते थे। * गुलरी और बड़कुले बनाना: घर में दादी-नानी के साथ बैठकर गोबर के छोटे-छोटे "बड़कुले" या "गुलरी" बनाना और उन्हें माला में पिरोना। उन मालाओं को धूप में सुखाने की जिम्मेदारी भी हमारी ही होती थी। * होलिका के चारों ओर घेरा: शाम को जब होलिका जलती थी, तो आग की उस तपिश के बीच परिक्रमा करना और फिर वह अधपके चने (होल) को आग में भूनकर खाना—उसका स्वाद किसी फाइव स्टार होटल के खाने से कहीं बढ़कर था। आज भले ही हम बड़े हो गए हैं और व्यस्तताओं के कारण शायद उस तरह से लकड़ियाँ नहीं जुटा पाते, लेकिन वो उत्साह आज भी दिल में कहीं सुरक्षित है। 🎨🔥

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