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*📜 06 फरवरी 📜* *🌹 परमवीर चक्र से सम्मानित 'नायक यदुनाथ सिंह' // बलिदान दिवस 🌹* जन्म : 21 नवंबर 1916 मृत्यु : 06 फ़रवरी 1948 बलिदान दिवस: 6 फरवरी (1948)। जन्म: 21 नवंबर 1916, खजूरी गाँव, शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश। शौर्य गाथा: 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, नौशेरा के तैन धार में अपनी चौकी पर दुश्मन के तीन हमलों को विफल करने के बाद घायल होने के बावजूद, उन्होंने स्टेनगन से अकेले ही हमलावरों का सामना किया और वीरतापूर्ण वीरगति प्राप्त की। सम्मान: उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार 'परमवीर चक्र' से सम्मानित किया गया। उपनाम: उन्हें 'हनुमान भक्त' और बाल ब्रह्मचारी के रूप में भी जाना जाता था। परमवीर चक्र से सम्मानित नायक यदुनाथ सिंह का जन्म 21 नवम्बर 1916 को शाहजहाँपुर (उत्तर प्रदेश) के गाँव खजूरी में हुआ था। 21 नवम्बर 1941 को यदुनाथ सिंह ने फौज में प्रवेश किया। उन्हें राजपूत रेजिमेंट में लिया गया। वहीं उनको जुलाई 1947 में लान्स नायक के रूप में तरक्की मिली और इस तरह 6 जनवरी 1948 को वह टैनधार में अपनी टुकड़ी की अगुवाई कर रहे थे और इस जोश में थे कि वह नौशेरा तक दुश्मन को नहीं पहुँचने देंगे। उस दिन नायक यदुनाथ सिंह मोर्चे पर केवल 9 लोगों की टुकड़ी के साथ डटे हुए थे कि दुश्मन ने धावा बोल दिया। यदुनाथ अपनी टुकड़ी के लीडर थे। उन्होंने अपनी टुकड़ी की जमावट ऐसी तैयार की, कि हमलावरों को हार कर पीछे हटना पड़ा। एक बार मात खाने के बाद दुश्मन ने दुबारा हौसला बनाया और पहले से ज्यादा तेजी से हमला कर दिया। इस हमले में यदुनाथ के चार सिपाही बुरी तरह घायल हो गये। लेकिन यदुनाथ का हौसला बुलंद था।भारतीय फौजों की अलग अलग मोर्चों पर कामयाबी ने पाकिस्तानी सैनिकों को परेशान किया हुआ था। उनका मनोबल तथा आत्मविश्वास वापस लाने के लिए पाकिस्तानी टुकड़ियों से उनके नायक दूरदराज के इलाकों में हमला करवा रहे थे। दुश्मन का अगला निशाना नौशेरा था। उसके लिए पाकिस्तानी ब्रिगेडियर उस्मान हर संभव तैयारी कर लेना चाहते थे। नौशेरा के उत्तरी छोर पर पहाड़ी ठिकाना कोट था, जिस पर दुश्मन जमा हुआ था। नौशेरा की हिफाजत के लिए यह जरूरी था कि कोट पर कब्जा कर लिया जाए। 1 फरवरी 1948 को भारत की 50 पैरा ब्रिगेड ने रात को हमला किया और नौशेरा पर अपना कब्जा मजबूत कर लिया। इस संग्राम में दुश्मन को जान तथा गोला बारूद का बड़ा नुकसान उठाना पड़ा और हार कर पाकिस्तानी फौज पीछे हट गई। 6 फरवरी 1948 को पाकिस्तानी फौजों ने तीसरा हमला कर दिया। यदुनाथ सिंह का जोश इस स्थिति का सामना करने को तैयार था। इस बार दुश्मन की फौज की गिनती काफ़ी थी और वह ज्यादा जोश में भी थे। यदुनाथ के पास कोई भी सिपाही लड़ने के लिए नहीं बचा था, सभी घायल और नाकाम हो चुके थे। ऐसे में नायक यदुनाथ सिंह ने फुर्ती से अपने एक घायल सिपाही से स्टेनगन ली और लगातार गोलियों की बौछार करते हुए बाहर आ गये। इस अचानक आपने सामने की लड़ाई से दुश्मन एक दम भौचक रह गया। और उसे पीछे हटना पड़ा। इस बीच पाकिस्तानी ब्रिगेडियर उस्मान सिंह को हालात का अंदाज़ा हो गया था और उन्होंने 3 पैरा राजपुत की टुकड़ी टैनधार की तरफ भेज दी थी। यदुनाथ सिंह को उनके आने तक डटे रहना था। तभी अचानक एक सनसनाती हुई गोली आई और यदुनाथ सिंह के सिर को भेद गई। वह वहीं रणभूमि में गिरे और हमेशा के लिए सो गये। उनकी इस शहादत से उनके घायल सैनिकों में जोश का संचार हुआ और वह उठ खड़े हुए। तब तक, 3 पैरा राजपूत की टुकड़ी भी वहाँ पहुँच चुकी थी। नौशेरा पर दुश्मन नाकाम ही रहा, लेकिन नायक यदुनाथ सिंह वीरगति को प्राप्त करते हुए और मरणोपरांत परमवीर चक्र के अधिकारी हुए। 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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