
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
232 days ago
परमपिता ब्रह्मा जी द्वारा असुरों की उत्पत्ति की एक अनोखी कथा- ब्रह्माजी ने अपने जघन देश से कामासक्त असुरों को उत्पन्न किया। वे अत्यन्त कामलोलुप होने के कारण उत्पन्न होते ही मैथुन के लिये ब्रह्माजी की ओर चले ,यह देखकर पहले तो वे हँसे किन्तु फिर उन निर्लज्ज असुरों को अपने पीछे लगा देख भयभीत और क्रोधित होकर बड़े जोर से भागे ॥ तब उन्होंने भक्तों पर कृपा करने के लिये उनकी भावना के अनुसार दर्शन देनेवाले, शरणागत वत्सल वरदायक श्रीहरि के पास जाकर कहा— 'परमात्मन् ! मेरी रक्षा कीजिये मैंने तो आपकी ही आज्ञा से प्रजा उत्पन्न की थी, किन्तु यह तो पाप में प्रवृत्त होकर मुझको ही तंग करने चली है ॥ नाथ ! एकमात्र आप ही दु:खी जीवों का दुःख दूर करनेवाले हैं और जो आपकी चरण शरण में नहीं आते, उन्हें दुःख देनेवाले भी एकमात्र आप ही हैं प्रभु तो प्रत्यक्षवत् सबके हृदय की जानने वाले हैं। उन्होंने ब्रह्माजी की आतुरता देखकर कहा—'तुम अपने इस कामकलुषित शरीर को त्याग दो।' भगवान् के यों कहते ही उन्होंने वह शरीर भी छोड़ दिया ॥ (ब्रह्माजी का छोड़ा हुआ वह शरीर एक सुन्दरी स्त्री—सन्ध्या देवी के रूप में परिणत हो गया।) उसके चरण कमलों के पायजेब झंकृत हो रहे थे। उसकी आँखें मतवाली हो रही थीं और कमर करधनी की लड़ों से सुशोभित सजीली साड़ी से ढकी हुई थी ॥ उसके उभरे हुए स्तन इस प्रकार एक-दूसरे से सटे हुए थे कि उनके बीच में कोई अन्तर ही नहीं रह गया था। उसकी नासिका और दन्तावली बड़ी ही सुघड़ थी तथा वह मधुर-मधुर मुसकराती हुई असुरों की ओर हाव-भावपूर्ण दृष्टि से देख रही थी ॥ वह नीली-नीली अलकावली से सुशोभित सुकुमारी मानो लज्जा के मारे अपने अंचल में ही सिमटी जाती थी। विदुरजी ! उस सुन्दरी को देखकर सब-के-सब असुर मोहित हो गये ।'अहो ! इसका कैसा विचित्र रूप, कैसा अलौकिक धैर्य और कैसी नयी अवस्था है। देखो, हम काम पीड़ितों के बीच में यह कैसी बेपरवाह-सी विचर रही है' ॥ इस प्रकार उन कुबुद्धि दैत्यों नें स्त्रीरूपिणी संध्या के विषय में तरह-तरह के तर्क-वितर्क करके फिर उसका बहुत आदर करते हुए प्रेमपूर्वक पूछा— 'सुन्दरि ! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो ? भामिनि ! यहाँ तुम्हारे आने का क्या प्रयोजन है ? तुम अपने अनूप रूप का यह बेमोल सौदा दिखाकर हम अभागों को क्यों तरसा रही हो ॥ अबले ! तुम कोई भी क्यों न हो, हमें तुम्हारा दर्शन हुआ—यह बड़े सौभाग्य की बात है। तुम अपनी गेंद उछाल-उछालकर तो हम दर्शकों के मन को मथे डालती हो सुन्दरि ! जब तुम उछलती हुई गेंद पर अपनी हथेली की थपकी मारती हो, तब तुम्हारा चरण-कमल एक जगह नहीं ठहरता; तुम्हारा कटिप्रदेश स्थूल स्तनों के भार से थक-सा जाता है और तुम्हारी निर्मल दृष्टि से भी थकावट झलकने लगती है। अहो ! तुम्हारा केशपाश कैसा सुन्दर है' इस प्रकार स्त्रीरूप से प्रकट हुई उस सायंकालीन सन्ध्या ने उन्हें अत्यन्त कामासक्त कर दिया और उन मूढ़ों ने उसे कोई रमणीरत्न समझकर ग्रहण कर लिया। तत्पश्चात ब्रह्माजी ने गंभीर भाव से हंसकर अपनी कांतिमयी मूर्ति से जो अपने सौंदर्य का मानो आप ही आस्वादन करती थी गंधर्व और अप्सराओं उत्पन्न किया ,उन्होंने चंद्रिका रूप आने उस कान्तिमय प्रिय शरीर को त्याग दिया उसी को विश्वा वाशु आदि गंधर्वों ने प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण किया ।

Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
