
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
21 days ago
शकुन-अपशकुन की मान्यता क्यों?( भाग 1) प्राचीन काल से ही भारत में शकुन द्वारा शुभाशुभ विचार करके यात्रा या किसी नवीन कार्य के आरम्भ करने की परंपरा रही है। प्रकृति से प्राप्त संकेत ही शकुन का आधार हैं। अच्छी या बुरी किसी भी महत्वपूर्ण घटना से पूर्व प्रकृति में कुछ विकार उत्पन्न होता है। हमारे ऋषि मुनियों ने इन प्राकृतिक विकारों का अपने अनुभव के आधार पर शुभाशुभ वर्गों में वर्गीकरण किया वास्तव में शकुन स्वयं न तो शुभ हैं न अशुभ , ये केवल इष्ट अथवा अनिष्ट के सूचक मात्र हैं। किसी महत्वपूर्ण कार्य को आरम्भ करते समय या उसके लिए यात्रा पर जाते समय शकुन पर विचार किया जाता है। शुभ शकुन होने पर कार्यसिद्धि तथा अशुभ शकुन होने पर कार्य की हानि का संकेत मिलता है। प्राचीन राजा –महाराजा भी अपने दरबार में विद्वान शकुनी को महत्वपूर्ण स्थान देते थे तथा प्रत्येक कार्य से पूर्व उसका परामर्श लेते थे। पुराणों में शकुन विचार वेदों, स्मृतियों, पुराणादि धर्मशास्त्रों एवं फलित ज्योतिष शास्त्रों तथा धर्मसिन्धु में शुभ-अशुभ शकुनों के विषय में विस्तार से जानकारी दी गई है। शकुन हेतु तुलसीकृत 'रामाज्ञा-प्रश्न' एवं 'रामशलाका' भी प्रसिद्ध हैं। शकुन के संबंध में प्रसिद्ध ग्रंथ वसंतराज शाकुन का कथन है-'शुभाशुभज्ञानविनिर्णयाय हेतुर्नृणां यः शकुन अर्थात् जिन चिह्नों को देखने से 'शुभ-अशुभ' का ज्ञान हो-वह शकुन है। जिस चिह्न संकेत निमित्त द्वारा शुभ जानकारी मिले, वह शुभ शकुन और अशुभ जानकारी मिले, उसे अपशकुन कहते हैं। भगवान् राम की बारात चढ़ने के समय शकुन होने से मंगल हुआ, ऐसा रामायण में उल्लेख मिलता है। बनई न वरनत वनी बराता। होइ सगुन सुन्दर शुभदाता।। चारा चाषु वाम दिसि लेइ । मनहु सकल मंगल कहि देइ।। दाहिन काग सुखेत सुहावा । नकुल दरसु सब काहू पावा ॥ सानुकूल बह त्रिबिध बयारी । सघट सबाल आव बर नारी ॥ लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा । सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा ॥ मृगमाला फिरि दाहिनि आई । मंगल गन जनु दीन्हि देखाई ॥ छेमकरी कह छेम बिसेषी । स्यामा बाम सुतरु पर देखी ॥ सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना ॥ -रामचरितमानसाबालकांड 302/24 अग्नि पुराण के अनुसार शकुन दो प्रकार के होते हैं। 1.दीप्त शकुन 2.शांत शकुन दीप्त शकुन काल की सूक्ष्म गति को जानने वाले ऋषि मुनियों ने दीप्त शकुन का फल अशुभ व कार्य नाशक कहा है। दीप्त शकुन के छह भेद कहे गए हैं। 1👉 वेला दीप्त शकुन👉 शकुन का विचार करते समय दिन में विचरने वाले प्राणी रात्री को तथा रात्रिचर प्राणी दिन में शकुन कारक हों तो वेलादीप्त शकुन कहा जाता है। शकुनकालीन लग्न या नक्षत्र पाप ग्रह से पीड़ित हो तो भी वेला दीप्त शकुन होता है। 2👉 दिग्दीप्त शकुन👉 सूर्य जिस दिशा में स्थित हो उसे ज्वलिता ,जिस दिशा से आये हों उसे धूमिता तथा जिस दिशा में जाने वाले हों उसे अन्गारिणी कहते हैं। ये तीनों दिशाएँ दीप्त कही गयी हैं। दीप्त दिशा में होने वाले शकुन को दिग्दीप्त कहा गया है जिसका फल अशुभ व कार्य नाशक होता है। 3👉 देश दीप्त शकुन👉 जंगली पशु-पक्षी का गाँव व शहर में तथा शहर के पालतू पशु-पक्षियों का जंगल में दिखना देश दीप्त शकुन है। शकुन यदि अशुभ स्थान पर दिखाई दे तो भी देश दीप्त शकुन होता है जिस का फल अशुभ कहा गया है। 4👉 क्रिया दीप्तशकुन👉 कोई पुरुष,स्त्री या पशु पक्षी अपने स्वभाव के विरुद्ध आचरण करता हुआ दिखाई दे तो क्रिया दीप्त शकुन कहलाता है। 5👉 रुतदीप्त शकुन👉 फटी हुई ,कर्कश एवम रोने की आवाज का सुनाई देना रुतदीप्त शकुन कहलाता है। 6👉 जाति दीप्त शकुन👉 मांसाहारी प्राणियों का दर्शन जाति दीप्त शकुन कहलाता है जिसका फल कार्य की असफलता का सूचक है। शांत शकुन उपरोक्त सभी दीप्त शकुनों से विपरीत शकुनों वाले सभी शकुन शांत शकुन होते हैं जिनका दर्शन या श्रवण कार्य में सफलता का संकेत देता है। दीप्त व शांत दोनों ही शकुन दिखाई दें तो कठिनता से कार्य सिद्धि समझनी चाहिए। आगे हम शकुन अपशकुनो के विषय मे विस्तृत रूप से बता रहे है। छींक संबंधित शकुन अपशकुन 1- यदि घर से निकलते समय कोई सामने से छींकता है तो कार्य में बाधा आती है। अगर एक से अधिक बार छींकता है तो कार्य सरलता से संपन्न हो जाता है। 2- किसी मेहमान के जाते समय कोई उसके बाईं ओर छींकता है तो यह अशुभ संकेत है। 3- कोई वस्तु क्रय करते समय यदि छींक आ जाए तो खरीदी गई वस्तु से लाभ होता है। 4- सोने से पूर्व और जागने के तुरंत बाद छींक की ध्वनि सुनना अशुभ माना जाता है। 5- नए मकान में प्रवेश करते समय यदि छींक सुनाई दे तो प्रवेश स्थगित कर देना ही उचित होता है। 6- व्यावसायिक कार्य

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