
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
111 days ago
. “मैं बाँटता हूँ"” एक स्थान पर बड़े भारी जन-समुदाय के मध्य श्रीमदभागवत कथा चल रही थी। अनेक संत भी उपस्थित थे। कथा समाप्ति पर आरती के पश्चात प्रसाद वितरण के लिये मंच से किसी सज्जन विशेष का नाम लेकर उनसे कहा गया कि वह समस्त श्रद्धालुओं को फल-रूपी प्रसाद वितरण करें। नम्रता-पूर्वक वह सज्जन उठे, व्यास-पीठ और मंचस्थ सन्तों को प्रणाम कर इस सेवा के लिये आभार व्यक्त किया। श्रद्धालु पंक्तिबद्ध थे और प्रसाद के बाद उन सज्जन के द्वारा फल-प्रसाद भी ले रहे थे। अचानक उन सज्जन ने देखा कि पंक्ति में लगे, अपने कुछ परिचित मित्र-रिश्तेदार भी समीप आ रहे हैं, अब उनका भाव परिवर्तित होने लगा और पारिवारिक मित्रों का नम्बर आने पर हाथ से टोकरी में रखे सुन्दर और बड़े फल टटोलकर उन्हें देने लगे, जबकि इसके पूर्व वह बिना टोकरी में देखे जो फल हाथ में आता, उसे उठाकर प्रसादी दे रहे थे। यही हमारा स्वभाव है कि जब श्रीहरि कृपा कर हमें कुछ बाँटने के लिये कहते हैं; जिसमें कुछ भी हमारा अर्जित किया हुआ नहीं है, तब भी नम्रता का आचरण दिखाने के बाद भी हमारा अभिमान मस्तक उठा ही लेता है कि ‘मैं बाँटता हूँ।’ यह ‘मैं’ ही परिचित और अपरिचित का भेद डाल देता है, और सत्कर्म होते-होते भी पाप-कर्म हो जाता है। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। दृष्टि सम नहीं होती, अपना-पराया रह ही जाता है। जब यह भली-भाँति ज्ञात है कि इसमें मेरा कुछ भी नहीं है तब यह स्थिति होती है तो जो हमने ‘परिश्रम से कमाया’ है उसे बिना किसी चाटुकारिता के, बिना अपना बड़प्पन दिखाये कैसे दे दें ? श्रीमदभागवत-गीता के वचनों को रटकर सुनाना एक बात है और बिना सुनाये आचरण में लाना दूसरी। ‘तुम क्या लाये थे, जो बाँटोगे ?’ सब उसी ने दिया है, सब उसी का है, तुम पर तो कृपा कर बाँटने के लिये कहा था और तुम भेद कर बैठे। श्रीहरि की अहैतुकी कृपा से सत्कर्म का अवसर मिला और बुद्धि ने उसे पाप-कर्म में बदल दिया। श्रीहरि बार-बार अवसर देते हैं और हम बार-बार कोई न कोई भूल कर बैठते हैं। सब उनका, सब उनके, सब उन्हीं के लिये, उनमें सब, सब उनके, जगत् उन्हीं का तो रूप है। ० ० ० ॥जय जय श्री राधे॥ ********************************************

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