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*अरे वाह, भारत की "वैज्ञानिक" संस्कृति का एक और चमत्कारिक नमूना!* हमारा दावा है कि हमारे शास्त्र सबसे पहले विज्ञान बताते हैं, हमारे ऋषि-मुनि अंतरिक्ष यात्रा के फॉर्मूले लिख गए थे, और हम "हम फर्स्ट" हैं – दुनिया में सबसे पहले, सबसे आगे, सबसे श्रेष्ठ! लेकिन जब बात गंगा माँ में दूध बहाने की आती है, तो विज्ञान की बातें अचानक "पश्चिमी साजिश" हो जाती हैं। कल्पना कीजिए: शिवरात्रि है, महाशिवरात्रि है, या बस कोई श्रद्धालु जी ने सोचा – "भगवान को खुश करना है!" तो लीटरों-लीटर दूध लेकर घाट पर पहुँच गए। दूध बहाया, "हर हर महादेव!" चिल्लाया, और गंगा में दूध की सफेद धार बहती चली गई। पास में ही कुछ गरीब बच्चे खड़े हैं, आँखों में लार टपक रही है – "भैया, थोड़ा सा मिल जाए?" लेकिन नहीं, वो तो "पवित्र" दूध है, भगवान के लिए! (गरीब को देने से पाप लगेगा, लेकिन मछलियों को मारने से कोई पाप नहीं? वाह रे, धर्म!) विज्ञान क्या कहता है? सरल भाषा में: मछलियाँ लैक्टोज पचा नहीं सकतीं। उनके पास वो एंजाइम ही नहीं है जो दूध की चीनी (लैक्टोज) को तोड़ सके। दूध पानी में गिरता है, बैक्टीरिया उस पर टूट पड़ते हैं – प्रोटीन, फैट, शुगर सब खा जाते हैं। लेकिन इस "खाने" में इतना ऑक्सीजन लगता है कि नदी का घुलित ऑक्सीजन (dissolved oxygen) तेजी से खत्म हो जाता है। BOD (Biological Oxygen Demand) दूध का इतना ऊँचा होता है कि कच्चे सीवेज से भी ज्यादा! मतलब, दूध डालना सीवेज डालने से भी बुरा है। मछलियाँ साँस लेने की कोशिश करती हैं, लेकिन ऑक्सीजन नहीं मिलता – गला घोंटकर मर जाती हैं। फिर शैवालों की बूम (boom) हो जाती है, और पूरी जलीय जिंदगी उलट-पुलट हो जाती है। अरे भाई, गंगा माँ पहले से ही सीवेज, फैक्ट्री के केमिकल, प्लास्टिक और शवों से लदी पड़ी है। ऊपर से दूध का "अभिषेक" – जैसे कोई माँ को कहे, "तू तो माँ है, और कचरा भी खा ले!" फिर वही पुराना ड्रामा: बच्चे भूखे मर रहे हैं, स्टंटेड ग्रोथ है, कुपोषण है – भारत दुनिया में सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चों वाला देशों में शुमार है।👌💯 दूध जो बच्चों के विकास के लिए सोने से बढ़कर है, वो नदी में बहाया जा रहा है। एक लीटर दूध किसी गरीब बच्चे को पोषण दे सकता था, लेकिन नहीं – वो तो "धार्मिक" है, "पवित्र" है! सनातनी भाइयों, आप कहते हैं शास्त्र वैज्ञानिक हैं? तो बताइए, कौन कहता है कि दूध नदी में बहाओ, मछलियों को मारो, और गरीबों को भूखा रखो? आप "हम फर्स्ट" कहते हैं – हाँ, बिल्कुल फर्स्ट! सबसे पहले अंधविश्वास में, सबसे पहले संसाधनों की बर्बादी में, सबसे पहले पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने में! तो अगली बार अभिषेक करने से पहले थोड़ा सोच लें ! "हम फर्स्ट" बनना है, तो असली अर्थ में – पर्यावरण में फर्स्ट, करुणा में फर्स्ट, समझदारी में फर्स्ट! वरना, ये "वैज्ञानिक" संस्कृति बस हँसी का पात्र बनी रहेगी – दूध बहाते-बहाते खुद डूबते हुए!

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