
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
89 days ago
2.6.2026 महाराजा भर्तृहरि जी ने कहा है, *"भोगे रोगभयम्"* अर्थात *"व्यक्ति जितना भोगों को भोगेगा उतना ही उसको रोगी होने का भय है।"* इसका अर्थ यह हुआ कि यदि *"आप मन इंद्रियों पर संयम नहीं करेंगे, तो आप रोगी हो जाएंगे. जितना अधिक असंयम करेंगे, रोगी होने का उतना ही अधिक खतरा रहेगा। और जितना अधिक रोगी होंगे, उतनी ही आपकी आयु कम हो जाएगी। आप लंबे समय तक स्वस्थ होकर नहीं जी पाएंगे। साथ ही साथ दुखी भी रहेंगे।"* *"क्योंकि ईश्वर ने मनुष्य को जो इंद्रियां दी हैं, ये वस्तुओं का "उपभोग" करने के लिए दी हैं, अर्थात जीवन रक्षा के लिए हमें इन इंद्रियों का उपयोग करना चाहिए। रूप रस गंध आदि विषयों का "अंधाधुंध भोग नहीं" करना चाहिए।"* *"इसलिए यदि आप सुख पूर्वक अपना जीवन जीना चाहते हों, अपनी आयु को बढा़ना चाहते हों, तो अपने मन इंद्रियों पर संयम करें। जीवन रक्षा मात्र के लिए भोजन वस्त्र मकान आदि वस्तुओं का उपयोग करें। अंधाधुंध भोग विलास में न पड़ें। तभी आपका जीवन सुखमय एवं सफल होगा।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात।"*

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