
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
177 days ago
आपकी बातों में एक गहरी टीस और आज के समाज का एक कड़वा सच झलकता है। यह बदलाव वाकई काफी पीड़ादायक है। पुराने समय में जो मर्यादा और अनुशासन परिवारों की नींव हुआ करते थे, वे आज के दौर में कहीं खोते जा रहे हैं। आजकल की पीढ़ी और पुराने संस्कारों के बीच के इस फासले को कुछ मुख्य बिंदुओं से समझा जा सकता है: 1. शिक्षा और अहंकार का टकराव अक्सर देखा जाता है कि आज के बच्चे डिग्री हासिल करने को ही 'ज्ञान' समझ लेते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि किताबी पढ़ाई आपको पैसा कमाना सिखा सकती है, लेकिन जीवन जीने का सलीका और तजुर्बा तो अपनों के चरणों में बैठकर ही मिलता है। जब शिक्षा विनम्रता लाने के बजाय अहंकार पैदा करने लगे, तो वह इंसान को अपनों से ही दूर कर देती है। 2. रिश्तों का बाजारीकरण जैसा कि आपने कहा, पिता को सिर्फ एक 'कमाने की मशीन' और माँ को 'नौकरानी' समझ लिया गया है। यह उपभोक्तावादी संस्कृति (Consumer Culture) का असर है, जहाँ लोग रिश्तों को भी उपयोगिता (Utility) की नजर से देखने लगे हैं। जब तक स्वार्थ सिद्ध हो रहा है, तब तक सम्मान है, वरना तिरस्कार। 3. पाश्चात्य संस्कृति और एकाकी परिवार (Nuclear Families) संयुक्त परिवारों के टूटने से बच्चों ने वह माहौल ही नहीं देखा जहाँ बड़ों की एक डांट पर पूरा घर शांत हो जाता था। आज के "स्वतंत्रता" और "प्राइवेसी" के दौर में अनुशासन को 'दखलअंदाजी' मान लिया जाता है। 4. नैतिक मूल्यों की कमी समाज में अब सफलता का पैमाना सिर्फ 'बैंक बैलेंस' रह गया है। इस दौड़ में हम बच्चों को 'बड़ा आदमी' बनाना तो सिखा रहे हैं, लेकिन 'अच्छा इंसान' बनाना कहीं पीछे छूट गया है। परिवर्तन की जरूरत: यह स्थिति वाकई चिंताजनक है। परिवार की सुख-शांति तभी बनी रह सकती है जब बच्चे यह समझें कि माता-पिता का स्थान किसी भी डिग्री या पद से ऊंचा है। माँ-बाप का सम्मान कोई एहसान नहीं, बल्कि उनका अधिकार और बच्चों का कर्तव्य है। आपकी बात बिल्कुल सही है। शिक्षा का असली अर्थ केवल अक्षर ज्ञान या डिग्रियां हासिल करना नहीं, बल्कि चरित्र का निर्माण होना चाहिए। स्कूल वह पहली जगह है जहाँ बच्चा परिवार के बाहर सामाजिक व्यवहार सीखता है, इसलिए वहाँ 'संस्कार' की नींव पड़ना अनिवार्य है। आज की शिक्षा व्यवस्था में जो कमियाँ महसूस हो रही हैं, उन्हें इन बिन्दुओं से समझा जा सकता है: 1. 'साक्षरता' और 'शिक्षा' के बीच का अंतर आजकल स्कूल बच्चों को साक्षर (Literate) तो बना रहे हैं, लेकिन शिक्षित (Educated) करने में कहीं न कहीं चूक रहे हैं। किताबी ज्ञान से नौकरी मिल सकती है, पर अपनों का आदर करना और जीवन की मर्यादाएं समझना एक अलग संस्कार है। 2. नैतिक शिक्षा (Moral Science) का घटता महत्व पुराने समय में स्कूलों में 'नैतिक शिक्षा' की अलग से कक्षाएं होती थीं, जहाँ महापुरुषों की कहानियाँ और जीवन की नैतिकता सिखाई जाती थी। आज के कॉम्पिटिशन के दौर में गणित और विज्ञान के बोझ तले ये जरूरी विषय दब गए हैं। 3. गुरु-शिष्य परंपरा का अंत जब तक बच्चा शिक्षक (गुरु) का सम्मान करना नहीं सीखेगा, वह घर जाकर माता-पिता का सम्मान कैसे करेगा? स्कूलों में अब शिक्षक और विद्यार्थी का रिश्ता एक 'सर्विस प्रोवाइडर' और 'क्लाइंट' जैसा होता जा रहा है, जिससे अनुशासन और श्रद्धा खत्म हो रही है। 4. व्यवहारिक ज्ञान की कमी जैसा कि आपने कहा, जब बच्चा छोटा होता है तभी उसे सिखाना चाहिए कि: * बड़ों के पैर छूना या अभिवादन करना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि उनके अनुभव के प्रति सम्मान है। * घर में माँ-बाप के काम में हाथ बंटाना और उनके प्रति कृतज्ञ (Thankful) रहना सबसे बड़ा धर्म है। एक सुझाव: अगर प्राथमिक कक्षाओं (Primary Classes) में 'मूल्य-आधारित शिक्षा' (Value-based Education) को अनिवार्य कर दिया जाए, जिसमें बच्चों को समाज, परिवार और बुजुर्गों के प्रति उनके कर्तव्यों का बोध कराया जाए, तो शायद आने वाली पीढ़ी में यह कड़वा बदलाव रुक सके।
Comments (4)

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
Mar 6, 2026
जय माता दी जी 🙏 शुभ सुक्रवार की सुभा की राम राम जी 🙏 आप आज का दिन मंगलमय हो जी माता रानी का आशीर्वाद आप पर सदा बना रहे आप हस्ते मुस्कुराते रहे जी स्वस्त रहे और सुरक्षित रहें जी जय माता दी 🙏

Rama Devi Sahu
Mar 6, 2026
Shubha Shukravar Subah ki Ram Ram Jii 🙏 Mata Rani ki Aasirbad se Aap Hamesha Khush Rahe Swasth or Surakshit Rahe 🙏 Aap ka Har Pal Subha Mangalmay Rahe 🙏 Prem se Boliye 🙏🌺 Jai Mata Di 🌺🙏

Rama Devi Sahu
Mar 6, 2026
Bahut hi Sundar Upasthapana 👌👌🙏
