
SHREE SHARMA
92 days ago
एक बार की बात है, एक बहुत बड़े विद्वान और संत अपने आश्रम में शिष्यों को रामचरितमानस (रामायण) की कथा सुना रहे थे। आश्रम में रोज़ दूर-दूर से श्रद्धालु कथा सुनने आते थे। एक दिन कथा के दौरान एक नए जिज्ञासु व्यक्ति ने देखा कि महाराज जी पिछले कई महीनों से केवल 'बालकाण्ड'की ही कथा कह रहे हैं। वे रोज़ आते, भगवान श्री राम के जन्म, उनकी बाल-लीलाओं, ताड़का वध, जनकपुर आगमन और अंत में प्रभु श्री राम और माता सीता के विवाह की कथा सुनाकर भाव-विभोर हो जाते। विवाह संपन्न होते ही वे कथा को विश्राम दे देते और अगले दिन फिर किसी नए भाव से वहीं से कथा शुरू करते। उस व्यक्ति को बड़ी हैरानी हुई। उसने देखा कि संत कभी 'अयोध्याकाण्ड' (जहाँ राम वनवास की बात है) पर जाते ही नहीं थे। कथा समाप्त होने के बाद वह व्यक्ति एकांत में संत के पास गया। उसने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और पूछा, "महाराज जी, क्षमा कीजिएगा, लेकिन मेरे मन में एक जिज्ञासा है। आप इतने परम ज्ञानी हैं, पर आप हमेशा श्री राम के विवाह तक ही रामायण क्यों पढ़ते और सुनाते हैं? आप इसके आगे अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड या लंकाकाण्ड क्यों नहीं पढ़ते?" संत की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने बड़े शांत और करुण स्वर में कहा: "बेटा, मैं इसके आगे पढ़ने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता। जब मैं राम जी के विवाह तक पढ़ता हूँ, तो अयोध्या में चारों तरफ खुशियाँ होती हैं। राजा दशरथ आनंदित हैं, माताएँ निहाल हैं, और चारों भाइयों का विवाह होकर जनकपुर से सुंदर दुल्हनें अयोध्या आई हैं। हर तरफ उत्सव का माहौल है।" संत ने अपनी आँखें पोंछते हुए आगे कहा: "लेकिन जैसे ही मैं इसके आगे पन्ना पलटता हूँ, 'अयोध्याकाण्ड' शुरू हो जाता है। वहाँ आते ही कोपभवन, कैकेयी के दो वरदान और मेरे सुकुमार प्रभु श्री राम को 14 वर्ष के वनवास की बात शुरू हो जाती है। जब मैं पढ़ता हूँ कि राम, लक्ष्मण और सीता नंगे पैर, राजसी ठाट-बाट छोड़ कर दुखी अयोध्यावासियों को रोता छोड़ वन की ओर जा रहे हैं, तो मेरा हृदय फट जाता है।" "मुझसे अपने प्रभु का वह कष्ट, माता सीता के पैरों के छाले और राजा दशरथ का पुत्र-वियोग में तड़पकर प्राण त्यागना नहीं देखा जाता। मेरा कोमल मन उस दुःख को सहन नहीं कर पाता। इसलिए मैं रामायण को वहीं रोक देता हूँ जहाँ मेरे प्रभु सुखी और आनंद में हैं। मैं अपने जीते जी उन्हें कभी वनवास नहीं भेजना चाहता।" यह सुनकर वह जिज्ञासु व्यक्ति संत के चरणों में गिर पड़ा। उसे समझ आ गया कि ज्ञान से भी ऊपर 'भक्ति और भाव' होता है, जहाँ भक्त भगवान को कोई कष्ट में नहीं देखना चाहता। यह कहानी हमें सिखाती है कि भगवान की भक्ति का चरम स्तर क्या होता है। जब एक भक्त भगवान से इतना प्रेम करने लगता है कि वह उनके जीवन के दुखों को भी सच मानकर तड़प उठता है, तो वह ज्ञान की सीमाओं को पार कर जाता है। रामायण केवल पढ़ने की किताब नहीं है, यह जीने और महसूस करने का भाव है।

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