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1.8.2026 आज हम देखते हैं बड़े-बड़े सेठों के पास बहुत संपत्ति है। *"इतनी है कि उनकी चार पीढ़ी बैठकर खाना खाए, तो भी खत्म नहीं होगी। इसके बाद भी वे लोग दुखी हैं, तनाव में हैं, चिंतित और परेशान हैं। क्या कारण है? उनके जीवन में संतोष नहीं है।"* *"संतोष का अर्थ है, पूर्ण पुरुषार्थ करने के पश्चात जितना धन संपत्ति और अन्य वस्तुएं फल के रूप में प्राप्त हों, उतने में खुश रहें। शोर न करें। शिकायत न करें, कि "बहुत परिश्रम किया, तब भी फल बहुत थोड़ा मिला।" जितना भी फल मिले उतने में ही खुश रहें। फिर अगली योजना बनाएं। उसके लिए फिर से पुरुषार्थ करें। इसका नाम है संतोष।"* *"पुरुषार्थ नहीं करना, आलसी बनकर भाग्य के भरोसे बैठे रहना, इसका नाम संतोष नहीं है। यह तो आलस्य का लक्षण है।"* *"अतः पूर्ण पुरुषार्थ करें। फिर जितना फल मिले, उतने में खुश रहें। ईश्वर का धन्यवाद करें, और समाज के लोगों का भी धन्यवाद करें, कि उन सब के सहयोग से आपको इतना फल मिला। ऐसा करने से आप सुखी रहेंगे।"* *"यदि इस प्रकार से संतोष का पालन नहीं करेंगे, और अच्छा खासा फल मिलने के बाद भी लोभ करेंगे, अपनी फल की इच्छाएं बढ़ाते जाएंगे, तो सदा दुखी रहेंगे।"* *"अब संतोष का पालन करना और लोभ करना, ये दोनों रास्ते आपके सामने हैं। आपको जो अच्छा लगे, उस पर चलें।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात।"*

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