MyMandirInstall
Profile

SHREE SHARMA

124 days ago

भक्ति मार्ग में यह कहा गया है कि— "जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।" इसी भाव को पुष्ट करती यह कथा दो मित्रों की है, जो परम भक्त थे। इनमें से एक भगवान श्रीराम का अनन्य उपासक था और दूसरा भगवान श्रीकृष्ण का। दोनों के हृदय में अपने-अपने इष्ट के प्रति अगाध श्रद्धा थी, किंतु मानवीय स्वभाव के कारण उनमें अक्सर यह बहस छिड़ जाती थी कि किसके भगवान अधिक श्रेष्ठ और शीघ्र फल देने वाले हैं। एक बार वे दोनों एक सघन वन से गुजर रहे थे। वहां उन्होंने अपनी इस दुविधा का अंत करने का निश्चय किया। उन्होंने तय किया कि हम दोनों अपने-अपने इष्टदेव को पुकारेंगे। जो भगवान पहले दर्शन देंगे, उन्हीं को श्रेष्ठ माना जाएगा। दोनों अपनी-अपनी साधना में लीन हो गए। कृष्ण-भक्त ने भाव विभोर होकर पुकारा और देखते ही देखते मुरलीधर श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्कुराते हुए प्रकट हो गए। कृष्ण-भक्त की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने बड़े गर्व से अपने मित्र की ओर देखा। कुछ समय बीता, फिर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भी वहां प्रकट हुए। राम-भक्त ने प्रभु के चरणों में शीश तो नवाया, पर उसके मन में टीस थी। उसने उलाहना देते हुए कहा, "हे प्रभु! आपने आने में इतनी देर क्यों कर दी? श्रीकृष्ण तो क्षण भर में आ गए और आपके विलंब के कारण मैं अपने मित्र से हार गया।" भगवान श्रीराम ने मंद मुस्कान के साथ अपने भक्त से पूछा, "वत्स, यह बताओ कि तुमने मुझे किस रूप में स्मरण किया था?" भक्त ने उत्तर दिया, "प्रभु! मैंने आपको साकेत बिहारी, चक्रवर्ती सम्राट और 'राजाधिराज' के रूप में पुकारा था।" श्रीराम बोले, "पुत्र, जब तुमने मुझे राजाधिराज के रूप में याद किया, तो मैं सामान्य व्यक्ति की भांति दौड़कर कैसे आ सकता था? राजा के आने के लिए पहले सवारी तैयार होती है, लश्कर सजता है और पूरी राजसी व्यवस्था की जाती है। इसी कारण मुझे आने में समय लगा।" अब श्रीकृष्ण के भक्त से पूछा गया कि उसने प्रभु को कैसे याद किया? उसने कहा, "मैंने तो केवल यह सोचा कि मेरे कान्हा 'गौपाल' हैं, वे इसी वन में कहीं गाय चरा रहे होंगे। मैंने उन्हें एक साधारण ग्वाले के रूप में पुकारा और वे तुरंत झाड़ियों से निकलकर सामने आ गए।" इसी प्रसंग में भगवान की सर्वव्यापकता का एक और सुंदर उदाहरण मिलता है। जब भरी सभा में दुःशासन द्रौपदी का चीर खींच रहा था, तब द्रौपदी ने करुण पुकार लगाई— "हे द्वारकावासी कृष्ण! मेरी रक्षा करो।" जब भगवान ने चीर बढ़ाकर उनकी लाज बचा ली, तब बाद में द्रौपदी ने पूछा कि प्रभु, आपको आने में कुछ पलों का विलंब क्यों हुआ? भगवान ने बड़ी मार्मिक बात कही, "हे देवी! तुमने मुझे 'द्वारकावासी' कहकर पुकारा। मैं तो तुम्हारे हृदय में ही था, पर तुम्हारी पुकार के मान के लिए मुझे पहले द्वारका जाना पड़ा और फिर वहां से हस्तिनापुर आना पड़ा। यदि तुम मुझे 'यहीं' से पुकारती, तो मैं उसी क्षण प्रकट हो जाता।" यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान की प्राप्ति के लिए किसी भौगोलिक दूरी को तय करने की आवश्यकता नहीं है। सर्वव्यापकता: परमात्मा कण-कण में व्याप्त हैं। वे वहीं हैं, जहाँ हम उन्हें महसूस करें। भाव की प्रधानता: भगवान विधि-विधान से अधिक भक्त के सरल भाव के वश में होते हैं। दृष्टिकोण: यदि हम उन्हें दूर मानेंगे तो वे दूर हैं, और यदि हम उन्हें अपने भीतर या अपने पास मानेंगे, तो वे पलक झपकते ही उपलब्ध हैं। निष्कर्ष: ईश्वर को पाने के लिए नियम नहीं, प्रेम की शुद्धता चाहिए। भक्त जिस रूप और स्थान पर उन्हें बुलाता है, भगवान उसी मर्यादा का पालन करते हुए वहां पहुँच जाते हैं।

Post media

Comments (9)

बरखा शर्मा

बरखा शर्मा

Apr 30, 2026

🌸🌸JAY SHREE RADHE KRISHNA JI 🌸GOOD MORNING JI 🙏🌸🌸

SHREE SHARMA

SHREE SHARMA

Apr 28, 2026

🙏🌹🌹🌹

LALAN  KUMAR

LALAN KUMAR

Apr 28, 2026

jai shree Ram ji

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Apr 28, 2026

जय सीता राम🙏🙏🙏 सीता राम सीता राम कहिये जाके विधि राखे राम , जाके विधि कहिये जय श्री राम🙏🙏🙏

Sanjay  Ahlawat

Sanjay Ahlawat

Apr 28, 2026

जय श्री राम 🚩 सुप्रभात आपका दिन मंगलमय हो

बरखा शर्मा

बरखा शर्मा

Apr 28, 2026

🌼Jay shree Ram Jay🌼 Vir Hanuman ji 🌼Suprabhat ji