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यह प्रसंग श्रीमद्भागवत पुराण के छठे स्कंध में वर्णित **अजामिल** की कथा है। यह भक्ति की शक्ति और ईश्वर के नाम की महिमा का एक बहुत ही सुंदर उदाहरण है। ## अजामिल और नाम-महिमा की कथा अजामिल एक ब्राह्मण था जो मार्ग से भटक गया था और उसने अपना पूरा जीवन अधर्म और पापों में बिताया। जब उसका अंत समय निकट आया, तो उसे लेने के लिए यमराज के दूत (यमदूत) आए। * **पुत्र मोह का निमित्त:** अजामिल के सबसे छोटे पुत्र का नाम **नारायण** था। मृत्यु को सामने देख वह भयभीत हो गया और उसने अपने पुत्र को पुकारा— "नारायण! नारायण!" * **प्रभु के दूतों का आगमन:** जैसे ही उसने 'नारायण' शब्द का उच्चारण किया, भगवान विष्णु के पार्षद (विष्णुदूत) वहां प्रकट हो गए। उन्होंने यमदूतों को उसे ले जाने से रोक दिया। * **तर्क और न्याय:** यमदूतों ने कहा कि अजामिल महापापी है, लेकिन विष्णुदूतों ने समझाया कि चाहे अनजाने में या किसी और को पुकारने के लिए ही सही, उसने भगवान के परम पावन नाम का उच्चारण किया है। नाम की अग्नि ने उसके जन्म-जन्मांतर के पापों को भस्म कर दिया है। ### इस कथा का सार यह कथा हमें सिखाती है कि: 1. **नाम की शक्ति:** ईश्वर के नाम में इतनी शक्ति है कि वह अनजाने में लेने पर भी कल्याण करता है। 2. **अनुताप (पछतावा):** इस घटना के बाद अजामिल को अपनी भूलों का अहसास हुआ और उसे पश्चाताप करने का एक और अवसर मिला, जिसके बाद उसने अपना शेष जीवन तपस्या और भक्ति में बिताया। 3. **ईश्वर की दया:** परमात्मा केवल न्याय नहीं करते, वे दयालु भी हैं और अपने भक्तों की पुकार कभी अनसुनी नहीं करते। निश्चय ही, यह प्रसंग मन में गहरी **अनुशासन** और **श्रद्धा** पैदा करने वाला है।

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