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SHREE SHARMA

5 days ago

. 🌷 ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या 🌷 उपनिषद में एक प्यारी कथा है। याज्ञवल्क्य घर छोड़ कर जा रहे हैं।जीवन के अंतिम दिन आ गए हैं और अब वह चाहते हैं, कि दूर खो जाए किन्हीं पर्वतों की गुफाओं में। उसकी दो पत्नियां थीं और बहुत धन था उसके पास। वह उस समय के प्रकांड पंडित थे। उनका कोई मुकाबला नहीं था पंडितों में। तर्क में उसकी प्रतिष्ठा थी। ऐसी उसकी प्रतिष्ठा थी कि जनक ने एक बार एक बहुत बड़ा सम्मेलन किया और एक हजार गौएं, उनके सींग सोने से मढ़वा कर और उनके ऊपर बहुमूल्य वस्त्र डाल कर महल के द्वार पर खड़ी कर दीं और कहा:- जो पंडित विवाद जीतेगा, वह इन हजार गौओं को अपने साथ ले जाने का हकदार होगा। यह पुरस्कार है। बड़े पंडित इकट्ठे हुए। दोपहर हो गई। बड़ा विवाद चला। कुछ तय भी नहीं हो पा रहा था कि कौन जीता, कौन हारा। और तब दोपहर को याज्ञवल्क्य आए, अपने शिष्यों के साथ। दरवाजे पर उसने देखा–गौएं खड़ी-खड़ी सुबह से थक गई हैं, धूप में उनका पसीना बह रहा है। उसने अपने शिष्यों को कहा, ऐसा करो, तुम गौओं को खदेड़ कर घर ले जाओ, मैं विवाद निपटा कर आता हूं। जनक की भी हिम्मत नहीं पड़ी यह कहने की कि यह क्या हिसाब हुआ, पहले विवाद तो जीतो! किसी एकाध पंडित ने कहा कि यह तो नियम के विपरीत है–पुरस्कार पहले ही ! लेकिन याज्ञवल्क्य ने कहा, मुझे भरोसा है। तुम फिक्र न करो। विवाद तो मैं जीत ही लूंगा, विवादों में क्या रखा है ! लेकिन गौएं थक गई हैं, इन पर भी कुछ ध्यान करना जरूरी है। शिष्यों से कहा, तुम फिक्र ही मत करो, बाकी मैं निपटा लूंगा। शिष्य गौएं खदेड़ कर घर ले गए। याज्ञवल्क्य ने विवाद बाद में जीता। पुरस्कार पहले ले लिया। बडे प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। बहुत धन उसके पास था। बड़े सम्राट उसके शिष्य थे। और जब वह जाने लगे, उसकी दो पत्नियां थीं, उसने उन दोनों पत्नियों को बुला कर कहा कि आधा-आधा धन तुम्हें बांट देता हूं। बहुत है, सात पीढ़ियों तक भी चुकेगा नहीं। इसलिए तुम निश्चिंत रहो, तुम्हें कोई अड़चन न आएगी। और मैं अब जंगल जा रहा हूं। अब मेरे अंतिम दिन आ गए। अब ये अंतिम दिन मैं परमात्मा के साथ समग्रता से लीन हो जाना चाहता हूं। अब मैं कोई और दूसरा प्रपंच नहीं चाहता। एक क्षण भी मैं किसी और बात में नहीं लगाना चाहता। एक पत्नी तो बड़ी प्रसन्न हुई, क्योंकि इतना धन था याज्ञवल्क्य के पास, उसमें से आधा मुझे मिल रहा है, अब तो मजे ही मजे करूंगी। लेकिन दूसरी पत्नी ने कहा कि इसके पहले कि आप जाएं, एक प्रश्न का उत्तर दे दें। इस धन से आपको शांति मिली ? इस धन से आपको आनंद मिला ? इस धन से आपको परमात्मा मिले क्या ? अगर मिल गए तो फिर कहां जाते हो ? और अगर नहीं मिले तो यह कचरा मुझे क्यों पकड़ाते हैं ? फिर मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूँ। और याज्ञवल्क्य जीवन में पहली बार निरुत्तर खडे थे। अब इस स्त्री को क्या कहें ! कहे कि नहीं मिला, तो फिर बांटने की इतनी अकड़ क्या ! बड़े गौरव से बांट रहै थे, कि देखो इतने हीरे-जवाहरात, इतना सोना, इतने रुपये, इतनी जमीन, इतना विस्तार ! उनमें थोड़ा अहंकार तो रहा ही होगा उस क्षण में कि देखो कितना दे जा रहा हूँ ! किस पति ने कभी अपनी पत्नियों को इतना दिया है ! लेकिन दूसरी पत्नी ने उसके सारे अहंकार पर पानी फेर दिया। उसने कहा, अगर तुम्हें इससे कुछ भी नहीं मिला तो यह कचरा हमें क्यों पकड़ाते हो ? यह उलझन हमारे ऊपर क्यों डाले जाते हो ? अगर तुम इससे परेशान होकर जंगल जा रहे हो तो आज नहीं कल हमें भी जाना पड़ेगा। तो कल क्यों, आज ही क्यों नहीं ? मैं चलती हूं तुम्हारे साथ। तो जो धन बांट रहा है वह क्या खाक बांट रहा है ! उसके पास कुछ और मूल्यवान नहीं है। और जो ज्ञान बांट रहा है, पाठशालाएं खोल रहा है, धर्मशास्त्र समझा रहा है, अगर उन्होंने ब्रह्म को पा लिया है तो ये कचरा क्यों बांट रहे हैं ? जिसका कोई मूल्य नहीं है ? और अगर उन्होंने स्वयं ब्रह्म को नहीं पाया तो फिर बांट क्या रहे हैं ?

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Comments (2)

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Oct 17, 2026

🙏‼️ Hari Om ‼️🙏