
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
113 days ago
एक बार सखा मधुमंगल, गर्गाचार्य जी की बातों को याद करते हुए श्रीकृष्ण से पूछता है कि क्या वे सच में भगवान हैं। कान्हा मुस्कुराते हुए इस बात को स्वीकार कर लेते हैं। जब मधुमंगल यह बात अन्य सखाओं को बताता है, तो कुछ उनका मजाक उड़ाते हैं और कुछ उन्हें चुनौती देते हैं, लेकिन कोई भी सहजता से यह मानने को तैयार नहीं होता कि उनका मित्र साक्षात ईश्वर है। एक बार नंद बाबा ब्रज में जागरण के बाद ब्रह्म मुहूर्त में यमुना स्नान के लिए जाते हैं। देव काल में स्नान करने के कारण वरुण देव के दूत (गंधर्व) उन्हें पकड़कर ले जाते हैं। जब वे बहुत देर तक नहीं लौटते, तो श्रीकृष्ण यमुना के भीतर जाकर उन्हें छुड़ाकर लाते हैं। लौटने पर नंद बाबा ब्रजवासियों को बताते हैं कि पानी के भीतर बहुत सुंदर महल हैं और वहां के देवता लाला (कृष्ण) के चरणों में नतमस्तक होकर उनकी आरती कर रहे थे। यह सुनकर ब्रजवासियों की उत्सुकता बढ़ जाती है और वे कान्हा से कहते हैं कि यदि तुम सच में भगवान हो, तो हमें 'वैकुंठ' दिखाओ। भगवान कृष्ण अपने प्रेम के वशीभूत होकर सभी ग्वाल-बालों को आंखें बंद करने के लिए कहते हैं और उन्हें सीधे वैकुंठ लोक ले जाते हैं। वहां का वैभव देखकर सब चकित रह जाते हैं। जय-विजय द्वारपाल स्वागत करते हैं, देवता पुष्प वर्षा करते हैं और इंद्र अपना ऐरावत हाथी लेकर कान्हा की सेवा में हाजिर हो जाते हैं। ब्रजवासी वहां ब्रह्मा जी के दर्शन करते हैं और वैकुंठ के हर कोने का आनंद लेते हैं। अंत में, जब ठाकुर जी कहते हैं कि अब आप लोग यहीं वैकुंठ में निवास करें क्योंकि यहाँ आने के बाद कोई वापस नहीं जाता, तो ब्रजवासी दुखी हो जाते हैं। वे कान्हा के चरणों में गिरकर रोने लगते हैं और कहते हैं कि हमें यह ऐश्वर्य, इंद्र का हाथी या स्वर्ग के सुख नहीं चाहिए; हमें तो बस अपना वृंदावन, यमुना जी और गोवर्धन पर्वत प्रिय है। यह लीला यह सिद्ध करती है कि ब्रजवासियों के लिए कृष्ण का प्रेम और उनकी जन्मभूमि का सुख वैकुंठ के ऐश्वर्य से कहीं बढ़कर है। भगवान भी देवताओं को दिखाते हैं कि उनके भक्त उनसे इतना प्रेम करते हैं कि वे मुक्ति या वैकुंठ को भी ठुकरा देते हैं। राधे राधे

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