
SHREE SHARMA
456 days ago
सिन्धुर्विन्दुमहो प्रयच्छति न हि स्वैरी च धाराधर: संकल्पेन विना ददाति न कदाप्यल्पञ्च कल्पद्रुम:। स्वच्छन्दोऽपि विधु: सुधावितरणे रात्रेन्दिवापेक्षते दाता कोऽपि न दृश्यते विनियमं श्रीकृष्णचन्द्रं विना।। यह जो समुद्र है, वह एक बुंद भी किसीको नहीं देता। मेघ भी किसीके चाहने से नहीं, अपने मनसे बरसाता है। विना संकल्पके कल्पवृक्ष भी कुछ नहीं देता। स्वत: अमृतबर्षा करनेवाली चन्द्रमा भी रात्रि होने की प्रतीक्षा करती है । एकमात्र श्रीकृष्णचन्द्रके विना अनियमितरूपसे कृपादान करनेवाला और कोई दिखायी नहीं देता। 🌸🌸🌸🌸🌸 जय श्रीकृष्ण 🌸🌸🌸🌸🌸

Comments (1)

neeraj
Jun 15, 2025
जय श्री कृष्ण
