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SHREE SHARMA

414 days ago

सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोई पाकी॥ धन्य घरी सोई जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा॥ अर्थ : वह धन धन्य है, जिसकी पहली गति होती है (जो दान देने में व्यय होता है) वही बुद्धि धन्य है, जो पुण्य में लगी हुई है। वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें ब्राह्मण की अखंड भक्ति हो। (धन की तीन गतियां होती हैं - दान, भोग और नाश। दान उत्तम है, भोग मध्यम है और नाश नीच गति है। जो पुरुष ना दान करता है, ना भोगता है, उसके धन की तीसरी गति होती है।)✅🙏

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