
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
126 days ago
भक्त के वश में हैं भगवान इस पोस्ट में पढ़िए एक अद्भुत कथा पांडुरंग विट्ठल की अनन्य भक्त सख़ूबाई की….. महाराष्ट्र में कृष्णा नदी के किनारे करहाड़ नामक एक स्थान है, वहाँ एक ब्राह्मण रहता था। उसके घर में चार प्राणी थे- ब्राह्मण, उसकी स्त्री, पुत्र और साध्वी पुत्रवधू। ब्राह्मण की पुत्रवधू का नाम था ‘सखूबाई’। सखूबाई जितनी अधिक भक्त और सरल हृदय थी उसकी सास उतनी ही अधिक दुष्टा और कठोर हृदय थी। पति व पुत्र भी उसी के स्वभाव का अनुसरण करते थे। सख़ूबाई अपने सभी कष्टों को भूलकर मन ही मन भगवान् के त्रिभुवन स्वरूप का अखण्ड ध्यान और केशव, विठ्ठल, कृष्ण गोविन्द नामों का स्मरण करती रहती। एक दिन एक पड़ोसिन ने उसकी ऐसी दशा को देखकर कहा- ‘‘क्या तेरे पीहर में कोई नहीं है जो तेरी खोज ख़बर ले’। सखू ने कहा ‘‘मेरा पीहर पण्ढ़रपुर है, मेरे माँ-बाप रुक्मिणी-कृष्ण हैं। एक दिन वे मुझे अपने पास बुलाकर मेरा दुःख दूर करेंगे।’’ एक दिन सखूबाई घर के काम ख़त्म कर कृष्णा नदी से पानी भरने गयी, तभी उसने देखा कि भक्तों के दल पण्ढ़रपुर जा रहे हैं। उसकी भी पण्ढ़रपुर जाने की प्रबल इच्छा हुई पर घरवालों से आज्ञा का मिलना असम्भव जान कर वह इस संत मण्डली के साथ चल दी। यह बात एक पड़ोसिन ने उसकी सास को बता दी। माँ के कहने पर पुत्र घसीटते हुए सखू को घर ले आया और उसे रस्सी से बाँध दिया, परन्तु सखू का मन तो प्रभु के चरणों में ही लगा रहा। वह प्रभु से रो-रोकर दिन-रात प्रार्थना करती रही। सखू की पुकार को सुनकर भगवान् एक स्त्री का रूप धारण कर उसके पास आकर बोले- "मैं तेरी जगह बँध जाऊँगी, तू चिन्ता मत कर।" यह कहकर उन्होंने सखू के बंधन खोल दिये और उसे पण्ढ़रपुर पहुँचा दिया। जिनके नाम स्मरण मात्र से माया के दृढ़ बन्धन टूट जाते हैं, वे भक्त के लिए सारे बंधन स्वीकार करते हैं। सखू बने भगवान् को बँधे दो हफ्ते हो गये। उधर सखू यह भूल गयी कि उसकी जगह दूसरी स्त्री बँधी है। प्रभु के ध्यान में उसकी समाधि लग गयी और शरीर अचेत हो जमीन पर गिर पड़ा। गाँव के लोगों ने उसका अंतिम संस्कार कर दिया। माता रुक्मिणी को चिन्ता हुई कि मेरे स्वामी सखू की जगह पर बहू बने हैं। उन्होंने शमशान पहुँचकर सखू की अस्थियों को एकत्रित कर उसे जीवित किया और सब स्मरण कराकर करहड़ जाने की आज्ञा दी। वो अपने घर लौटी किंतु तभी एक ब्राह्मण सखू के मरने का समाचार सुनाने करहड़ आया। सखू को देख उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सखू के ससुर से कहा- ‘‘तुम्हारी बहू तो पण्ढ़रपुर में मर चुकी थी।" पति ने कहा- ’’सखू तो पण्ढ़रपुर गयी ही नहीं, तुम भूल से ऐसा कहते हो।" जब सखू से पूछा तो उसने सारी घटना सुना दी। सभी को अपने कुकृत्यों पर पश्चात्ताप हुआ। वे भगवान की लीला को समझ चुके थे। उनके हृदय शुद्ध हो गए और उन्होंने सारा जीवन प्रभु भक्ति में लगा दिया। प्रभु अपने भक्तों के लिए क्या कुछ नहीं करते।

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