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आज १० अप्रैल, २०२६, वैशाख कृष्ण अष्टमी है। श्रीमद्भगवद्गीता के **अध्याय १३ (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग)** का **श्लोक ३३** आत्मज्ञान की सूक्ष्मता को समझने के लिए एक बहुत ही सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण आत्मा की निर्लिप्तता (Non-attachment) को आकाश के दृष्टांत से समझा रहे हैं: ### **श्लोक ३३** > **यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।** > **सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३३ ॥** > ### **शब्दार्थ (Word Meanings)** * **यथा:** जिस प्रकार * **सर्वगतं:** सर्वत्र व्याप्त (सब जगह फैला हुआ) * **सौक्ष्म्यात्:** सूक्ष्म होने के कारण * **आकाशं:** आकाश * **न उपलिप्यते:** लिप्त नहीं होता (प्रभावित नहीं होता) * **सर्वत्र:** सब जगह * **अवस्थित:** स्थित * **देहे:** शरीर में * **तथा:** उसी प्रकार * **आत्मा:** जीवात्मा * **नोपलिप्यते:** लिप्त नहीं होती ### **भावार्थ** जिस प्रकार **आकाश** सर्वत्र व्याप्त है, किंतु अपने **सूक्ष्म** होने के कारण किसी भी वस्तु (कीचड़, सुगंध, दुर्गंध आदि) से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार शरीर में सब जगह स्थित होने पर भी **आत्मा** शरीर के गुणों या दोषों से लिप्त नहीं होती। ### **मुख्य संदेश और व्याख्या** * **आकाश का उदाहरण:** आकाश (Space) हर जगह है। वह एक गंदे नाले के भीतर भी है और एक पवित्र मंदिर में भी। लेकिन नाले की गंदगी आकाश को गंदा नहीं कर सकती। आकाश हमेशा शुद्ध रहता है क्योंकि वह उन पदार्थों से बहुत अधिक 'सूक्ष्म' है। * **आत्मा की स्थिति:** हमारा शरीर निरंतर बदलता रहता है—बीमार होता है, वृद्ध होता है, सुखी या दुखी होता है। आत्मा इस शरीर के अंग-अंग में व्याप्त है, फिर भी वह शरीर के इन विकारों (बदलावों) से पूरी तरह अछूती रहती है। * **साधना का दृष्टिकोण:** यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हमारी वास्तविक पहचान (आत्मा) निर्दोष और दिव्य है। यदि हम खुद को शरीर मान लेते हैं, तो हम कष्ट पाते हैं; लेकिन यदि हम 'आकाश' की तरह निर्लिप्त होना सीख जाएं, तो संसार के दुःख हमें विचलित नहीं कर पाएंगे।

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