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SHREE SHARMA

67 days ago

रामचरितमानस के उत्तरकांड में कागभुशुंडि जी और गरुड़ जी के संवाद के अंतर्गत प्रभु श्री राम के बाल रूप की दिव्यता और कागभुशुंडि जी के मोह (भ्रम) की एक बेहद सुंदर और अलौकिक कथा आती है। यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान की लीलाओं को समझने में बड़े-बड़े ज्ञानी भी कभी-कभी भ्रमित हो जाते हैं, लेकिन प्रभु की कृपा से ही वह मोह दूर होता है। कागभुशुंडि जी कौवे के रूप में भगवान श्री राम के परम भक्त हैं। जब प्रभु श्री राम ने अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ बाल रूप में अवतार लिया, तब कागभुशुंडि जी उनके दर्शन के लिए व्याकुल हो उठे। वे अयोध्या आए और एक कौवे का रूप धारण करके राजा दशरथ के आंगन में रहने लगे। वहां वे प्रभु श्री राम की बाल सुलभ लीलाओं को देखते। कभी प्रभु घुटनों के बल चलते, कभी आंगन में गिरते, और कभी कागभुशुंडि जी को देखकर अपनी नन्हीं उंगलियों से पकड़ने की कोशिश करते। कागभुशुंडि जी भी उनके साथ खेलते और प्रभु के द्वारा गिराए गए भोजन के कणों (प्रसाद) को पाकर धन्य होते। एक दिन प्रभु श्री राम आंगन में ठुमुक-ठुमुक चल रहे थे। उनका शरीर सांवला और अत्यंत सुंदर था। तभी कागभुशुंडि जी के मन में एक क्षण के लिए एक विचार (संदेह) आ गया कि "क्या ये वही पूर्ण ब्रह्म, संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी नारायण हैं, जो एक साधारण बालक की तरह डर रहे हैं, रो रहे हैं और भोजन के लिए मचल रहे हैं?" जैसे ही उनके मन में यह 'मोह' या संदेह आया, भगवान श्री राम ने अपनी माया का खेल शुरू किया। कागभुशुंडि जी जैसे ही उड़कर प्रभु के पास जाने लगे, प्रभु ने हंसते हुए अपनी कोमल और सांवली बांह को उनकी तरफ बढ़ाया। कागभुशुंडि जी डरकर आकाश में उड़ गए। लेकिन उन्होंने देखा कि वे जितना भी ऊंचे उड़ते, प्रभु की वह नन्हीं सी बांह हमेशा उनके ठीक पीछे, बस दो उंगल की दूरी पर रहती थी। वे उड़ते-उड़ते ब्रह्मलोक, शिवलोक और न जाने कितने ब्रह्मांडों में घूम आए, लेकिन प्रभु का हाथ उनके पीछे ही रहा। थक-हारकर जब वे वापस अयोध्या लौटे, तो प्रभु श्री राम ने हंसते हुए अपना मुख खोला और कागभुशुंडि जी सीधे उनके मुख के भीतर समा गए। प्रभु के उदर (पेट) में प्रवेश करते ही कागभुशुंडि जी के होश उड़ गए। उन्होंने वहां जो देखा, वह अकल्पनीय था उन्हें प्रभु के पेट के अंदर करोड़ों ब्रह्मांड दिखाई दिए। हर ब्रह्मांड में अलग सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, नदियां, पर्वत और देवता (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) दिखाई दिए। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि वे जिस-जिस ब्रह्मांड में गए, वहां उन्हें अयोध्यापुरी, राजा दशरथ का आंगन और बालक राम की वही लीलाएं दिखाई दीं। वे इस ब्रह्मांड चक्र में सदियों तक घूमते रहे, लेकिन प्रभु के पेट के भीतर समय का कोई अंत नहीं था। इस असीम दिव्यता को देखकर कागभुशुंडि जी का सारा ज्ञान, अभिमान और मोह नष्ट हो गया। वे समझ गए कि जिसे वे एक साधारण बालक समझ रहे थे, वे साक्षात परम ब्रह्म हैं और पूरा ब्रह्मांड उनके भीतर ही वास करता है। जब कागभुशुंडि जी पूरी तरह व्याकुल हो गए, तब कृपालु श्री राम ने हंसते हुए उन्हें अपने मुख से बाहर निकाल दिया। बाहर आते ही उन्होंने देखा कि वे वापस अयोध्या के उसी आंगन में खड़े हैं और समय भी बिल्कुल नहीं बीता था। प्रभु राम वैसे ही मुस्कुराते हुए उनकी तरफ देख रहे थे। कागभुशुंडि जी प्रभु के चरणों में गिर पड़े और उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी। तब प्रभु ने उन्हें आशीर्वाद दिया और अपनी अचल भक्ति का वरदान दिया। भगवान की बाललीला केवल साधारण मनुष्य जैसी दिखती है, लेकिन वह पूरी तरह दिव्य होती है। ईश्वर की माया इतनी प्रबल है कि ज्ञानी भी भ्रमित हो सकते हैं, लेकिन जब जीव पूरी तरह शरणागत हो जाता है, तो भगवान उसका मोह दूर कर उसे अपने विराट और आनंदमयी रूप का दर्शन कराते हैं। 🙏जय सियाराम 🙏

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Comments (1)

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Jun 24, 2026

🙏🏹 Jai Shree Ram 🏹🙏