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15.4.2026 कुछ लोग पुस्तक पढ़ते हैं, प्रवचन सुनते हैं, और बात वहीं खत्म। *"न उस पढ़े सुने विषय पर पर चिंतन मनन करते, न कोई अच्छा सा निर्णय लेते, कि अब मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं? और न ही उस पर कोई आचरण करते। इसलिए उनका कल्याण नहीं हो पाता। थोड़ा सा शब्द ज्ञान प्राप्त करके वे समझते हैं, कि हमारा कर्तव्य पूरा हो गया।"* परंतु ध्यान रहे, इतने से कर्तव्य पूरा नहीं होता। *"जब तक उस शाब्दिक ज्ञान को वे अपने जीवन में नहीं उतारेंगे, तब तक किसी का भी कल्याण नहीं होगा।"* *"इसलिए शाब्दिक ज्ञान भले ही प्राप्त करें। परंतु उस पर आचरण भी अवश्य करें। तभी सबका कल्याण होगा।"* क्योंकि यह नियम है कि *"शाब्दिक ज्ञान से आचरण करना सदा ही उत्तम होता है।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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