
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
58 days ago
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती आकाश मार्ग से विहार कर रहे थे। उन्होंने देखा कि एक नवजात शिशु (राक्षस सुकेश) लावारिस पड़ा रो रहा है। माता पार्वती के ममतामयी स्वभाव के कारण उन्होंने शिव जी से उस बालक की रक्षा का आग्रह किया। भगवान शिव ने उस बालक को 'अमरत्व' जैसा बल दिया और माता पार्वती ने उसे यह वरदान दिया कि राक्षस कुल का जो भी बालक जन्म लेगा, वह तुरंत अपनी माता की आयु के बराबर बड़ा और शक्तिशाली हो जाएगा। इस वरदान के कारण राक्षसों की संख्या और शक्ति बहुत तेजी से बढ़ने लगी थी। जब हनुमान जी ने लंका में सीता माता का पता लगा लिया और लंका दहन कर दिया, तब उन्हें माता पार्वती के उस प्राचीन वरदान का स्मरण हुआ। उन्होंने सोचा: यदि रावण की सेना के योद्धा मारे भी गए, तो राक्षस स्त्रियाँ तुरंत नए शक्तिशाली योद्धाओं को जन्म दे देंगी। वरदान के प्रभाव से वे बच्चे तुरंत युद्ध के योग्य बड़े हो जाएंगे। इससे प्रभु श्री राम को एक अंतहीन युद्ध लड़ना पड़ेगा। इस भविष्य के संकट को रोकने के लिए हनुमान जी ने लंका से लौटते समय समुद्र के ऊपर से गुजरते हुए अपनी पूरी शक्ति से भयंकर गर्जना की। रामचरितमानस के सुंदरकांड में तुलसीदास जी लिखते हैं: "चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥" इसका अर्थ है: हनुमान जी की वह गर्जना इतनी तीव्र और भयावह थी कि उसकी कंपन और भय से लंका की समस्त गर्भवती राक्षसियों के गर्भ गिर गए। इस प्रकार हनुमान जी ने युद्ध शुरू होने से पहले ही राक्षसों की आने वाली अगली पीढ़ी को समाप्त कर दिया, ताकि प्रभु श्री राम को विजय प्राप्त करने में कोई अतिरिक्त बाधा न आए। यह प्रसंग सिखाता है कि एक सच्चा भक्त वही है जो न केवल वर्तमान की बाधाओं को दूर करे, बल्कि अपने स्वामी के आने वाले संकटों को भी अपनी बुद्धि से पहले ही समाप्त कर दे। हनुमान जी की इसी कुशलता के कारण उन्हें 'बुद्धिमतां वरिष्ठम्' (बुद्धिमानों में श्रेष्ठ) कहा जाता है।

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