
SHREE SHARMA
45 days ago
"वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ।।" "गुप्त नवरात्रि" का प्रथम दिवस आद्यशक्ति भगवती के प्रथम स्वरूप "माँ शैलपुत्री" की आराधना को समर्पित है। यह केवल एक पर्व का आरम्भ ही नहीं, अपितु आत्मजागरण, साधना, शक्ति-संचय और ईश्वरानुभूति की दिव्य यात्रा का प्रथम चरण है। इस दिन सम्पूर्ण सृष्टि में आदिशक्ति की मंगलमयी चेतना का विशेष संचार होता है और साधक अपने अंतःकरण को देवी की कृपा ग्रहण करने योग्य बनाता है। ‘शैलपुत्री’ अर्थात्, पर्वतराज हिमालय की पुत्री। हिमालय केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि अचलता, धैर्य, तप, निर्मलता और दिव्य ऊँचाइयों का प्रतीक है। अतः "माँ शैलपुत्री" हमें यह सन्देश देती हैं कि आध्यात्मिक जीवन की प्रथम आवश्यकता है - अविचल विश्वास, अडिग संकल्प और धैर्यपूर्ण साधना। जो साधक पर्वत के समान स्थिर हो जाता है, उसी पर भगवती की कृपा सहज बरसती है। "माँ शैलपुत्री" वृषभ पर आरूढ़ हैं। वृषभ धर्म, संयम, श्रम, सहनशीलता और सात्त्विक जीवन का प्रतीक है। उनके करकमलों में सुशोभित त्रिशूल केवल एक आयुध नहीं, बल्कि यह त्रिविध ताप - आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखों के विनाश का प्रतीक है। उनके मस्तक पर शोभायमान अर्धचन्द्र मन की शीतलता, संतुलन और आत्मप्रकाश का दिव्य सन्देश देता है। भगवती की शक्ति सीमित नहीं, अनन्त है। उनका तेज केवल बाह्य प्रकाश नहीं, अपितु वह दिव्य चेतना है, जिससे समस्त ब्रह्माण्ड आलोकित है। सूर्य का प्रकाश, अग्नि का ताप, वायु की गति, जल की जीवनदायिनी शक्ति तथा पृथ्वी की धारणशक्ति; ये सब उसी पराशक्ति के विविध आयाम हैं। वे ही सृष्टि की सृजनशक्ति हैं, वे ही पालनशक्ति हैं और समय आने पर वही संहार के माध्यम से पुनः सृष्टि को संतुलित करती हैं। इसीलिए देवी को वेदों ने “विश्वस्य बीजम्” तथा उपनिषदों ने समस्त शक्ति का मूलाधार कहा है। देवी का अनुग्रह केवल भौतिक समृद्धि प्रदान करने तक सीमित नहीं है। उनका वास्तविक प्रसाद है - विवेक, निर्भयता, आत्मबल, करुणा, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और आत्मानुभूति। जब भगवती की कृपा साधक पर होती है, तब उसके भीतर सुप्त दिव्य शक्तियाँ जागृत होने लगती हैं। उसके जीवन से भय, संशय और दुर्बलता का क्षय होता है तथा आत्मविश्वास, तेजस्विता और ईश्वरनिष्ठा का उदय होता है। यही देवी की परम कृपा है। "गुप्त नवरात्रि" विशेष रूप से आन्तरिक साधना का पर्व है। यह बाह्य प्रदर्शन का नहीं, बल्कि मौन उपासना, मंत्रजप, ध्यान, आत्मसंयम और अन्तर्मुखी तप का काल है। इस अवधि में साधक अपने भीतर स्थित देवीतत्त्व को जागृत करने का प्रयास करता है। जब अंतःकरण निर्मल होता है, तभी भगवती का दिव्य प्रकाश उसमें प्रतिबिम्बित होता है। आज के इस पावन प्रथम दिवस पर हम सब "माँ शैलपुत्री" से प्रार्थना करें कि वे हमारे जीवन को धैर्य, शक्ति, पवित्रता और सद्बुद्धि से आलोकित करें। हमारे भीतर धर्म के प्रति अटूट निष्ठा, साधना के प्रति समर्पण, सेवा के प्रति करुणा तथा सत्य के प्रति अचल प्रतिबद्धता का जागरण करें। उनके दिव्य अनुग्रह से प्रत्येक परिवार में शान्ति, प्रत्येक हृदय में श्रद्धा, प्रत्येक समाज में सद्भाव और सम्पूर्ण विश्व में मंगल एवं करुणा का प्रकाश प्रस्फुटित हो। "माँ शैलपुत्री" समस्त प्राणिमात्र पर अपनी करुणामयी कृपादृष्टि बनाए रखें। वे समस्त त्रैलोक्य में शान्ति, समृद्धि, धर्म, सद्भाव और आध्यात्मिक चेतना का विस्तार करें। प्रत्येक साधक को आत्मबल, दिव्य विवेक और मोक्षमार्ग की प्रेरणा प्रदान करें। यही उनके श्रीचरणों में हमारी विनम्र प्रार्थना है।

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