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जय सिया राम रघुनंदन (भगवान श्री राम) की मुस्कान को अक्सर 'मंद-स्मित' कहा जाता है—एक ऐसी कोमल मुस्कान जो न केवल शांति प्रदान करती है, बल्कि जिसमें समस्त सृष्टि का सार और आनंद समाहित होता है। अध्यात्म में माना जाता है कि जब ईश्वर मुस्कुराते रहें करुणा और भक्तों के प्रति उनके अगाध प्रेम का प्रतीक होता है। तुलसीदास जी के उन भावों की याद दिलाती हैं जहाँ वे प्रभु के मुखमंडल की तुलना करोड़ों चंद्रमाओं की शीतलता से करते हैं। इस भाव की कुछ खास बातें: * शांति का प्रतीक: जहाँ संसार में हलचल है, वहीं राम की मुस्कान में ठहराव और परम शांति है। * वात्सल्य और करुणा: यह मुस्कान केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि शरणागत को अभयदान देने का वादा भी है। * अद्वैत का भाव: जैसा कि "सारा ब्रह्मांड समाया है"—यह दर्शाता है कि वह मुस्कान ही आदि है और वही अंत। > "राजीव नयन धरें धनु सायक, भगत बिपति भंजन। > मुख छवि कोटि मदन मद गंजन, जय जय रघुनंदन॥"

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