
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
104 days ago
*प्रजापति दक्ष की दो पुत्रियाँ थीं— कद्रू और विनता। दोनों का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था। कश्यप ने प्रसन्न होकर दोनों को वरदान माँगने को कहा।* कद्रू ने एक हजार प्रतापी नाग पुत्रों की इच्छा जताई। विनता ने केवल दो पुत्र माँगे, लेकिन शर्त रखी कि वे कद्रू के हजार पुत्रों से अधिक बलशाली हों। समय आने पर कद्रू ने १००० अंडे दिए और विनता ने २ अंडे दिए। कद्रू के अंडों से हजार नाग पैदा हुए, जिनमें शेषनाग और वासुकी प्रमुख थे। कद्रू के पुत्र जन्म ले चुके थे, लेकिन विनता के अंडे अभी नहीं फूटे थे। अधीर होकर विनता ने अपना एक अंडा खुद ही फोड़ दिया। उस अंडे से 'अरुण' पैदा हुए, जिनका शरीर आधा विकसित था। अरुण ने अपनी माँ को श्राप दिया कि— "जिस ईर्ष्या के कारण तुमने मुझे अधूरी अवस्था में बाहर निकाला, उसी के कारण तुम अपनी सौत (कद्रू) की दासी बनोगी। अब दूसरे अंडे को धैर्य से पालना, वही तुम्हें दासीत्व से मुक्त कराएगा।" (यही अरुण बाद में सूर्य देव के सारथी बने)। एक दिन कद्रू और विनता ने समुद्र मंथन से निकले सफेद घोड़े 'उच्चैःश्रवा' को देखा। विनता ने कहा कि यह पूरी तरह सफेद है। कद्रू ने छल करते हुए कहा कि इसकी पूंछ काली है। दोनों के बीच शर्त लगी कि जिसकी बात गलत होगी, वह दूसरी की दासी बनेगी। कद्रू ने अपने नाग पुत्रों से कहा कि वे बाल के समान सूक्ष्म होकर घोड़े की पूंछ से लिपट जाएँ ताकि वह काली दिखे। जिन नागों ने ऐसा करने से मना किया, उन्हें कद्रू ने 'जनमेजय के सर्प यज्ञ' में जलने का श्राप दे दिया। अगले दिन घोड़े की पूंछ काली दिखी और विनता शर्त हार गई। वह कद्रू की दासी बन गई। कुछ समय बाद विनता के दूसरे अंडे से गरुड़ का जन्म हुआ। गरुड़ अत्यंत विशाल और शक्तिशाली थे। अपनी माँ को दासी के रूप में देख उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने नागों से पूछा कि मेरी माँ कैसे मुक्त हो सकती है? नागों ने शर्त रखी— "यदि तुम स्वर्ग से अमृत लेकर आओ, तो हम तुम्हारी माँ को मुक्त कर देंगे।" गरुड़ ने स्वर्ग पर आक्रमण किया, इंद्र सहित सभी देवताओं को परास्त किया और अमृत कलश ले आए। अमृत सौंपते ही विनता दासीत्व से मुक्त हो गई। अमृत नागों को देने से पहले गरुड़ ने भगवान विष्णु से वरदान प्राप्त किया कि वे उनके वाहन बनेंगे और अमर रहेंगे। जब गरुड़ ने अमृत का कुश (घास) पर रखा, तो इंद्र ने चालाकी से उसे वापस उठा लिया। नाग केवल उस घास को चाट पाए, जिससे उनकी जीभ दो हिस्सों में बंट गई, लेकिन विनता हमेशा के लिए आजाद हो गई। कद्रू की ईर्ष्या ने उनके ही पुत्रों के लिए श्राप का मार्ग प्रशस्त किया। विनता की अधीरता ने उसके पहले पुत्र को अपंग बना दिया, जबकि धैर्य ने गरुड़ जैसा वीर पुत्र दिया।

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