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*गांव में एक दिन दासिया नाम का व्यक्ति कपड़े बेचने के लिए एक ब्राह्मण के घर पहुंचा। वहां उसने एक पेड़ पर ताजा नारियल का फल देखा। फल को देखकर दासिया ने ब्राह्मण से कहा, ब्राह्मण देव, क्या आप मुझे यह नारियल दे सकते हैं? मैं इसे अपने स्वामी जगन्नाथ जी को अर्पित करना चाहता हूं। इसकी जो भी कीमत हो, आप इसे इन कपड़ों में से काट लीजिए।* *अब देखिए, वह ब्राह्मण बड़ा लालची था। उसने एक नारियल के बदले में दासिया के सारे कपड़े खरीदने की बात मान ली। अब दासिया के पास कपड़े बेचकर ही थोड़े पैसे आते थे। जिससे उसका गुजारा चलता था। लेकिन आज इस ब्राह्मण ने सारे कपड़ों के बदले में सिर्फ एक नारियल ही दिया।* *अब दासिया क्या करें? क्या उसे और उसके परिवार को आज भूखा ही सोना पड़ेगा या फिर वह इस नारियल को अपने लिए इस्तेमाल करेगा? लेकिन नहीं। पूरे दिन की मेहनत के बाद सिर्फ नारियल मिलने पर भी दासिया खुश होते हुए उस नारियल को लेकर अपने घर लौटा।* *उसी दिन उसके गांव से कुछ ब्राह्मण जगन्नाथ पूरी जा रहे थे। दासिया ने उनसे निवेदन किया ब्राह्मण देव कृपया इस नारियल को अपने साथ ले जाइए। जब आप भगवान जगन्नाथ को अपना भोग अर्पित करेंगे तो उसके बाद मेरा यह नारियल भी उन्हें अर्पित कर दीजिएगा। लेकिन इसके लिए आप इस नारियल को अपने हाथ में लेकर गरुड़ स्तंभ के पास खड़े रहें और भगवान से कहें हे भगवान आपके दासिया ने आपके लिए यह नारियल भेजा है। अगर भगवान खुद अपना हाथ लंबा करके इस नारियल को लें तो इसे दे देना वरना वापस ले आना।* *ब्राह्मण को तो दासिया की यह बात मजाक जैसी लगी कि भगवान कैसे अपना हाथ लंबा करके नारियल लेंगे। फिर भी दासिया की खुशी के लिए उन्होंने नारियल लेकर जगन्नाथ पुरी जाने का फैसला किया। वहां जाकर उन्होंने अपनी पूजा समाप्त की तो उन्हें दासिया का नारियल याद आया। उन्होंने सोचा चलो देखता हूं क्या होता है।* *ब्राह्मण गरुड़ स्तंभ के पास नारियल लेकर खड़े हो गए और प्रार्थना करते हुए कहने लगे हे श्री जगन्नाथ बलिक्राम के दासिया ने आपके लिए यह नारियल भेजा है। कृपया इसे स्वीकार करें।* *जैसे ही भगवान जगन्नाथ ने यह सुना, उन्होंने अपना हाथ लंबा करके उस नारियल को ब्राह्मण के हाथ से ले लिया। ब्राह्मण यह देखकर हैरान रह गए। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे और उन्होंने दासिया का गुणगान करते हुए कहा, हे बलग्राम के दासिया तुम धन्य हो। तुम्हारे माता-पिता धन्य हैं। तुम्हारा गांव धन्य है। भगवान जगन्नाथ तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। तुम्हारी सदा जय हो। धीरे-धीरे यह खबर पूरे गांव में फैल गई और सभी ने दासिया की भक्ति और भगवान जगन्नाथ के साथ उनके विशेष संबंध की प्रशंसा की।*

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