
SHREE SHARMA
371 days ago
ऋषि शुक्राचार्य महर्षि भृगु के पुत्र थे और विष्णुभक्त प्रह्लाद उनके मामा लगते थे. शुक्रवार के दिन जन्म होने के कारण महर्षि भृगु ने उनका नाम "शुक्र" रखा. यही बालक आगे चलकर शुक्राचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ. उन्हें दैत्यों का गुरु कहा जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर शुक्राचार दैत्यों के गुरु कैसे बने. आइए जानते हैं कि दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य से जुड़ी पौराणिक कथा. शुक्राचार्य की शिक्षा और ज्ञान बचपन में शुक्राचार्य को शिक्षा ग्रहण करने के लिए अंग ऋषि के आश्रम भेजा गया. वहीं पर अंग ऋषि के पुत्र बृहस्पति भी पढ़ाई कर रहे थे. ऐसा कहा जाता है कि शुक्राचार्य की बुद्धि बृहस्पति से कहीं अधिक तीव्र थी, लेकिन अंग ऋषि अपने पुत्र को अधिक महत्व देते थे. इस भेदभाव से व्यथित होकर शुक्राचार्य ने आश्रम छोड़ दिया और आगे की शिक्षा सनक और गौतम ऋषि से प्राप्त की. दैत्यों के गुरु बनने का संकल्प जब शुक्राचार्य को पता चला कि बृहस्पति को देवताओं का गुरु बना दिया गया है, तो उनके मन में भी दैत्यों का गुरु बनने की भावना उत्पन्न हुई. परंतु समस्या यह थी कि असुर अमूमन देवताओं से पराजित हो जाते थे. इसलिए उन्होंने सोचा कि यदि वे भगवान शिव से संजीवनी विद्या प्राप्त कर लें, तो मृत दैत्यों को जीवित कर उन्हें शक्तिशाली बना सकते हैं. इसी उद्देश्य से शुक्राचार्य ने कठिन तपस्या आरंभ की. उनकी तपस्या के दौरान दैत्यों ने उनकी माता ख्याति की शरण ली. ख्याति इतनी शक्तिशाली थीं कि कोई भी देवता जब असुरों को मारने आता, तो वह उसे मूर्छित या विकलांग कर देती थीं. इस कारण दैत्यों की शक्ति बढ़ती गई और धरती पर अधर्म बढ़ने लगा. भगवान विष्णु से नफरत की वजह जब असुरों का अत्याचार अपनी सीमा पार करने लगा, तो भगवान विष्णु ने उन्हें रोकने के लिए शुक्राचार्य की माता ख्याति का सुदर्शन चक्र से वध कर दिया. यह घटना शुक्राचार्य के हृदय में विष्णु के प्रति गहरी नाराजगी का कारण बनी और उन्होंने मन में बदला लेने का संकल्प लिया. इस घटना के बाद उन्होंने शिव की तपस्या की और उनसे संजीवनी विद्या प्राप्त की. इस विद्या की सहायता से उन्होंने दैत्यों को फिर से संगठित कर अपने माता के वध का प्रतिशोध लिया. तभी से शुक्राचार्य और भगवान विष्णु के बीच नफरत हो गई. भृगु ऋषि का भगवान विष्णु को श्राप जब महर्षि भृगु को मालूम हुआ कि उनकी पत्नी ख्याति का वध स्वयं भगवान विष्णु ने किया है, तो उन्होंने विष्णु को श्राप दिया कि – "तुमने स्त्री वध किया है, इसलिए तुम्हें बार-बार धरती पर जन्म लेना होगा और गर्भ में रहकर कष्ट भोगना पड़ेगा." यह श्राप भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों का आधार माना जाता है. नवग्रहों में शुक्राचार्य का स्थान दैत्यों और देवताओं के युद्ध में जब भी असुर मारे जाते, शुक्राचार्य उन्हें फिर से जीवित कर देते थे. इससे असुरों को अपार शक्ति मिलने लगी और देवताओं के लिए संकट खड़ा हो गया. तब भगवान शिव ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए शुक्राचार्य को निगल लिया, ताकि वे अपनी विद्या का गलत प्रयोग न कर सकें. शुक्राचार्य ने शिव के पेट में रहते हुए भी उन्हें प्रसन्न कर लिया. प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें बाहर निकालकर आशीर्वाद दिया और शुक्र को नवग्रहों में एक शुभ ग्रह के रूप में प्रतिष्ठित किया.

Comments (9)

Rama Devi Sahu
Aug 24, 2025
Bhagwan ki Aasirbad Aap pr Hamesha Banaye Rakhe 🙏 Aap ka Din Subh Ho....

Rama Devi Sahu
Aug 24, 2025
Bahut hi Sundar Prasanga....!👌👌🌹

Rama Devi Sahu
Aug 24, 2025
Aap Acche Acche Post Share Karte hai...isi liye Bahut Bahut Dhanyawad 🙏

Rama Devi Sahu
Aug 24, 2025
Om Namah Shivay 🙏🔱🌿🌺🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️

V K Sharma
Aug 24, 2025
om namah shivoy

Saumya Sharma
Aug 24, 2025
भाई दिल्ली से

SHREE SHARMA
Aug 24, 2025
दीदी आप कहा से हो 🙏🙏

Saumya Sharma
Aug 24, 2025
हर हर महादेव 🙏 बहुत ही अच्छी जानकारी देती पोस्ट है भाई आपकी 👌👌👌 धन्यवाद 🙏🌹☺️

Saumya Sharma
Aug 24, 2025
ॐ घृणिः सूर्याय नमः 🙏 जगतप्रकाशित और आरोग्य प्रदान करने वाले भगवान सूर्यदेव आपको सदैव उत्तम स्वास्थ्य और सुख समृद्धि प्रदान करें 🙏🌹☺️ इसी शुभकामना के साथ सुप्रभात वंदन भैया जी 🙏🌹☺️
