
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
163 days ago
*"नवरात्रि में मांसाहारियों का व्रत" 🫣* 2 मिनट समय निकालकर #Thread अंत तक अवश्य पढ़े।🧵👇 🔏 लेखक : पंकज सनातनी नवरात्रि आते ही हमारी आस्था अचानक जाग उठती है। वही लोग, जो पूरे साल बिना सोचे-समझे मांसाहार करते हैं, इन 9 दिनों में खुद को सबसे बड़ा भक्त साबित करने में लग जाते हैं। नवरात्रियों से पहले होटलों में मांसाहारियों की बढ़ती भीड़ कोई संयोग नहीं है, बल्कि यह हमारी मानसिकता का आईना है। पहले भरपेट मांस खाओ, फिर नौ दिन 'पवित्र' बन जाओ— क्या यही भक्ति है, या सिर्फ आत्मसंतुष्टि का एक तरीका…? सच्चाई यह है कि हम धर्म का पालन कम, और "धर्म का प्रदर्शन" ज्यादा करते हैं। मांसाहारी इन नवरात्रों में किस देवी से डर कर मांसाहार नहीं करते हैं…? क्या बाकी दिन देवी उन्हें मांसाहार करने की आज्ञा दे देती है…? अगर नहीं, तो फिर क्यों नवरात्रियों के बाद वही लोग हिंसक और राक्षस प्रवृत्ति के हो जाते हैं…? यह दोहरी मानसिकता हमारी आस्था की सबसे बड़ी कमी है। अधिकांश मांसाहारी हिन्दू लोग कहते हैं कि हमारे शास्त्रों में लिखा है कि बली देने से देवी प्रसन्न होती हैं, इसलिए मांसाहार या बलि की प्रथा वैध है। यह धारणा पूरी तरह मिथक और समझ का अभाव है। हिंदू धर्म और शास्त्र बली प्रथा के नाम पर निर्दोष जीवों के हनन को कभी मान्यता नहीं देते। असली शास्त्र यह बताते हैं कि बलि केवल प्रतीकात्मक या नैतिक रूप से आंतरिक बलिदान का रूप है— अपने अहंकार, लोभ, लालच और बुरे कर्मों का त्याग करना। जिस किसी ने कभी शास्त्र में "बलि" पढ़ी होगी, वह जानता है कि उसमें केवल अहंकार और राक्षसी प्रवृत्तियों का अंत करने का संदेश है, न कि बेजुबान जीवों का हत्याकांड। जिस माँ को हम पूजा करते हैं, वह क्रूरता और रक्तपात से प्रसन्न नहीं होती। शास्त्रों में निर्दोष जीवों के लिए करुणा और दया की उपदेशना है। किसी भी धर्मग्रंथ में यह नहीं लिखा कि जानवरों की बलि से देवी प्रसन्न होंगी। असल में, मांसाहारी इसे बहाना बनाकर अपनी लालसा और हिंसक प्रवृत्ति को धर्म और धार्मिक अवसर का नाम दे देते हैं। यही हमारी दोहरी मानसिकता का सबसे बड़ा उदाहरण है। कटु सत्य यह है कि समस्या केवल मांसाहार या शाकाहार की नहीं है। समस्या हमारी "दोहरी मानसिकता" है। हम मंदिर में करुणा और अहिंसा की बात करते हैं, और बाहर निकलते ही संवेदनहीन हो जाते हैं। हम व्रत रखते हैं, लेकिन अपने व्यवहार में कोई स्थायी परिवर्तन नहीं लाते। धर्म कभी दिखावे से नहीं चलता, वह अनुशासन, निरंतरता और आत्मसंयम से चलता है। अगर हमारी आस्था सच्ची है, तो वह नौ दिनों तक सीमित नहीं रह सकती। नवरात्रि का असली उद्देश्य भूखे रहना या मांसाहार छोड़ना नहीं है, बल्कि अपने अहंकार, दिखावे और दोहरापन को त्यागना है। उसी दिन हमारी भक्ति सच्ची मानी जाएगी जब हम अपने विवेक और कर्मों में स्थायी सुधार लाएँ। धर्म का अपमान कोई बाहरी व्यक्ति नहीं करता, हम खुद करते हैं, जब उसे केवल रस्म और दिखावे तक सीमित कर देते हैं। मांसाहारी होने के नाम पर केवल नौ दिन धर्म का ढोंग करना और बाकी साल निर्दोष जीवों पर क्रूरता करना हमारी आस्था का सबसे बड़ा परित्याग है। हमें अपने कर्मों और आस्था में ईमानदार होना होगा, तभी नवरात्रि का व्रत, अहिंसा और भक्ति वास्तव में सार्थक बन पाएगी। ✍️ साभार *|| Share || Share || Share ||* *🚩 हमारी समिति के सभी संदेश नियमित पढ़ने हेतु हमारे निम्न व्हाट्सएप चैनल को अवश्य फॉलो किजिए॥ 🙏⛳🚩 ▬▬▬▬▬๑⁂❋⁂๑▬▬▬

Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
