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Rama Devi Sahu

78 days ago

कभी लगता था, विरह बस किसी अपने के चले जाने का नाम है। पर आज समझ पाया हूँ — विरह किसी के जाने से नहीं, किसी के भीतर उतर जाने से शुरू होता है। जब कोई तुम्हारी हर सांस, हर धड़कन में बस जाए, और फिर भी तुम्हारे पास न हो — वही तो विरह है। पहले लगता था, ये पीड़ा है। पर अब महसूस करता हूँ — ये तो एक साधना है। एक ऐसी अग्नि, जो मुझे जलाकर कुछ नया गढ़ रही है। अब हर अधूरी बात, हर अधूरा स्पर्श, मेरे भीतर किसी पूर्णता की तलाश बन चुका है। कभी-कभी लगता है, विरह ही तो असली प्रेम है — क्योंकि यहीं आकर समझ आता है कि प्रेम किसी व्यक्ति से नहीं, उसकी उपस्थिति से होता है — जो अब मेरे भीतर है, मेरी हर सांस में। अब मैं विरह से डरता नहीं... उसे जीता हूँ, उसे महसूस करता हूँ — *क्योंकि इसी ने मुझे मेरे भीतर के प्रेम तक पहुँचाया है* ......... ✍️

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Comments (3)

Suresh Kumar

Suresh Kumar

Jun 13, 2026

राधे राधे जी 🙏 शुभ रात्री वंदन

R k jangid 

phulera Jaipur

R k jangid phulera Jaipur

Jun 13, 2026

Jay Shri Radhe Krishna shubh ratri Vandan ji🙏

SHREE SHARMA

SHREE SHARMA

Jun 13, 2026

🙏🌹🙏🌹