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एक पिता का अनोखा मुकदमा *अदालत* में *हलचल* थी , लोगों की नजरें उस *बूढ़े शख्स* पर थीं, जो *धीमे कदमों से जज साहब* के सामने पेश हुआ। *झुकी हुई कमर और चेहरे पर झलकती उम्र* की लकीरों के साथ वह अपनी *शिकायत लेकर आया* था। जज साहब ने बड़े आदर से पूछा, "आपको क्या शिकायत है बाबाजी ?"* बूढ़े पिता ने संयमित स्वर में कहा, "जज साहब, मैं अपने बेटे से उसकी हैसियत के मुताबिक हर महीने खर्च मांगना चाहता हूं।" *जज साहब चौंक गए। बोले, "यह तो आपका अधिकार है। इसमें सुनवाई की क्या जरूरत?"* *पिता ने धीमे से मुस्कुराते हुए कहा,* "पैसे की मुझे जरूरत नहीं है, जज साहब। मेरे पास बहुत कुछ है। लेकिन फिर भी मैं अपने बेटे से हर महीने एक छोटी रकम लेना चाहता हूं।" अब जज साहब को और हैरानी हुई। "अगर आपको पैसों की जरूरत नहीं है, तो यह अजीब मांग क्यों?" *पिता ने गहरी सांस लेते हुए कहा,* "जज साहब, आप मेरे बेटे को अदालत में बुलवाइए, सब समझ में आ जाएगा।" *बेटा अदालत में पेश हुआ।* जज साहब ने उससे कहा, "तुम्हारे पिता चाहते हैं कि तुम हर महीने उन्हें 100 रुपये दिया करो, और वो भी अपने हाथों से।" *बेटा हंस पड़ा।* बोला, "जज साहब, मेरे पिता के पास तो *दौलत की कमी नहीं* है। यह बात तो बड़ी अजीब है।" जज साहब ने गंभीर स्वर में कहा, "यह तुम्हारे *पिता* की *इच्छा* है। अदालत इसे आदेश देती है कि तुम *हर महीने 100 रुपये उन्हें दोगे,* और वह भी देरी किए बिना।" *मुकदमे की सुनवाई खत्म हुई।* लेकिन जज साहब की जिज्ञासा शांत नहीं हुई। उन्होंने पिता को पास बुलाया और धीरे से पूछा, "बाबाजी, अगर बुरा न मानें तो एक सवाल पूछूं। आपने यह मुकदमा क्यों किया, जबकि आपको पैसों की जरूरत नहीं है?" यह सुनकर *बूढ़े पिता* की *आंखें छलक* पड़ीं। रुंधे हुए गले से उन्होंने कहा, "*जज साहब*, मैं अपने *बेटे का चेहरा* देखने को तरस गया हूं। वह इतना *व्यस्त* है कि *सालों* से उससे *मिलना तो दूर,* *बात* तक *नहीं* हो पाई। मैं उसका *पिता* हूं, और उससे *मिलने* का यह *छोटा-सा बहाना* बनाया है।" जज साहब की आंखें भी नम हो गईं। वह बोले, "अगर आपने पहले बताया होता, तो मैं उसे लापरवाही और नजरअंदाजी के जुर्म में सजा देता।" *पिता* ने धीमे से मुस्कुराते हुए कहा, "*जज साहब*, सजा देने से क्या होगा? वह मेरा बेटा है। मैं उसे *दुख* में *नहीं देख* सकता। मैं तो बस चाहता हूं कि हर महीने उसे देखने और उससे बात करने का एक मौका मिले। *यही मेरी असली दौलत है।"* उस दिन अदालत में खड़े हर व्यक्ति की आंखों में आंसू थे। *बूढ़े पिता* के प्यार की यह अनोखी *फरियाद* एक *सबक* थी , — संबंधों का मूल्य पैसों में नहीं, बल्कि साथ बिताए गए पलों में होता है। *सब कुछ मिल जाता है साथियो बाजार में पर मां के गोद जैसा स्वर्ग और पिता के कंधे जैसा साया कहीं नहीं मिलता !!* आप सभी का दिन शुभ हो 🙏🏻

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