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"दूसरों के लिए प्राण देने वाले ऋषि"** शीर्षक के अंतर्गत भारतीय पौराणिक और वैदिक परंपरा के उन महान तपस्वियों एवं विभूतियों का उल्लेख किया गया है, जिन्होंने लोक-कल्याण, धर्म और दूसरों की रक्षा के लिए अपने जीवन या देह का बलिदान दिया: ### 1. महर्षि दधीचि (अस्थि दान) * **कथा व त्याग:** जब असुर वृत्रासुर के आतंक से तीनों लोकों में हाहाकार मचा हुआ था, तब भगवान ब्रह्मा ने देवताओं को बताया कि वृत्रासुर का वध केवल महर्षि दधीचि की पवित्र अस्थियों (हड्डियों) से बने अस्त्र से ही संभव है। * **बलिदान:** देवराज इंद्र के याचना करने पर महर्षि दधीचि ने बिना किसी संकोच के लोक-कल्याण हेतु समाधि लगाकर योगबल से अपना शरीर त्याग दिया। उनकी अस्थियों से देवराज इंद्र के परम शक्तिशाली अस्त्र **'वज्र'** का निर्माण हुआ, जिससे वृत्रासुर का वध हुआ। ### 2. महर्षि उत्तंक / उत्तंक ऋषि (प्रजा रक्षा हेतु संकट सहन) * **कथा व त्याग:** महर्षि उत्तंक (चित्र में उत्तका) अपनी निष्ठा, सत्यवादिता और परोपकार के लिए प्रसिद्ध हैं। * **बलिदान:** जब धुन्धु नामक राक्षस प्रजा और साधु-संतों को त्रस्त कर रहा था, तब उन्होंने राजा कुवलाश्व (धुन्धुमार) को जागृत कर उस दैत्य के विनाश की प्रेरणा दी। उन्होंने समाज को भयमुक्त और सुरक्षित करने के लिए भयंकर ताप और संकट सहते हुए अपने तपोबल का उपयोग जन-कल्याण के लिए किया। ### 3. महर्षि आरुणि (जल-रक्षा हेतु समर्पण) * **कथा व त्याग:** आरुणि (उद्दालक आरुणि) महर्षि धौम्य के परम आज्ञाकारी शिष्य थे। एक बार मूसलाधार वर्षा में गुरुजी के आश्रम के खेत की मेड़ टूट गई और सारा पानी बहने लगा। * **बलिदान:** मिट्टी से मेड़ न रुकने पर आरुणि स्वयं उस टूटी हुई मेड़ के स्थान पर लेट गए। वे रातभर भीषण ठंड और तेज बहाव में जल-प्रवाह को रोके पड़े रहे, जिससे फसल और आश्रम की रक्षा हुई। उनकी इस गुरुभक्ति और देह-समर्पण ने उन्हें अमर बना दिया। ### 4. महर्षि उथथ्य / उतथ्य (सत्य व धर्म हेतु त्याग) * **कथा व त्याग:** महर्षि उतथ्य अंगिरा ऋषि के पुत्र और महर्षि बृहस्पति के ज्येष्ठ भ्राता थे। * **बलिदान:** महाभारत के शांति पर्व में उनके धर्मोपदेशों का विस्तृत वर्णन मिलता है। जब तत्कालीन शासकों या राजाओं ने धर्म का मार्ग छोड़ा, तब उतथ्य ने बिना किसी भय के राजा मांधाता को राजधर्म का पाठ पढ़ाया। उन्होंने सत्य, न्याय और प्रजा-कल्याण की रक्षा के लिए राजसत्ता के विरुद्ध खड़े होकर हर प्रकार का व्यक्तिगत कष्ट व त्याग स्वीकार किया। ### 5. जीमूतवाहन (नाग-रक्षा हेतु आत्म-बलिदान) * **कथा व त्याग:** जीमूतवाहन गंधर्वराज थे, जिन्होंने राजपाठ त्यागकर तपस्वी जीवन अपनाया था। * **बलिदान:** जब उन्हें ज्ञात हुआ कि नागों की रक्षा के लिए गरुड़ को प्रतिदिन एक नाग की बलि दी जाती है, और उस दिन शंखचूड़ नामक नाग की बारी थी, तो जीमूतवाहन ने उस नाग की माता के विलाप को देखकर स्वयं को लाल वस्त्र में लपेटकर वध्यशिला पर रख दिया। गरुड़ उन्हें नाग समझकर नोचने लगे, परंतु उनके मुख पर संतोष देखकर गरुड़ स्तब्ध रह गए। जीमूतवाहन के इस अप्रतिम आत्म-बलिदान से प्रभावित होकर गरुड़ ने भविष्य में नागों का भक्षण बंद करने की प्रतिज्ञा ली। ### 6. ऋषि जटायु (नारी रक्षा व धर्म युद्ध) * **कथा व त्याग:** महर्षि कश्यप की परंपरा से जुड़े और सूर्य के सारथी अरुण के पुत्र जटायु को पौराणिक ग्रंथों में तपोनिष्ठ पक्षीराज व ऋषि तुल्य माना गया है। * **बलिदान:** जब लंकापति रावण छल से माता सीता का हरण करके ले जा रहा था, तब जटायु ने वृद्धावस्था के बावजूद अधर्म का प्रतिकार किया। उन्होंने नारी के सम्मान और रक्षा के लिए अकेले महाबली रावण से भीषण युद्ध किया। रावण ने उनके पंख काट दिए, परंतु उन्होंने अंतिम सांस तक अपने प्राण रोके रखे ताकि वे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को सीता हरण की पूरी सूचना दे सकें। प्रभु श्रीराम ने स्वयं उनका अंतिम संस्कार एक पिता और ऋषि के समान किया। यह चित्र भारतीय संस्कृति के उस मूल सिद्धांत को दर्शाता है—**"आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च"** (अपने मोक्ष के साथ-साथ संसार के कल्याण के लिए जीना और आवश्यकता पड़ने पर प्राणों का उत्सर्ग कर देना)।

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