
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
169 days ago
राधे राधे जी 🙏🌹 शुभ दोपहर जी 🙏🌹 यह जीवन की उस कठोर वास्तविकता की ओर इशारा करता है जहाँ इंसान की अहमियत अक्सर उसके 'कर्म' और उसकी 'उपयोगिता' से जुड़ी होती है। जब तक इंसान का आचरण और उसके कर्म सही रहते हैं, लोग जुड़ाव महसूस करते हैं। लेकिन नैतिक पतन या गलत रास्तों पर चलने का परिणाम अक्सर अकेलापन ही होता है। समाज का एक कड़वा नियम यह भी है कि लोग अक्सर उगते सूरज को सलाम करते हैं; जब तक आप सामर्थ्यवान और चरित्रवान हैं, भीड़ साथ खड़ी रहती है। लेकिन जैसे ही चरित्र या कर्मों में गिरावट आती है, वही 'चार लोग' जो आज साथ होने का दावा करते हैं, सबसे पहले किनारा कर लेते हैं। यह विचार अनुशासन और सही संस्कारों की अहमियत को और पुख्ता करता है। इंसान को अपनी सेहत, अपने व्यवहार और अपने नैतिक मूल्यों का ध्यान खुद ही रखना पड़ता है, क्योंकि अंत में ये ही चीजें तय करती हैं कि बुरा वक्त आने पर कोई आपके पास खड़ा होगा या नहीं। यह सोचना बहुत जरूरी है कि चरित्र और कर्म ही इंसान की असली जमापूंजी हैं। अक्सर लोग चमक-धमक और बाहरी रिश्तों के पीछे भागते हैं, लेकिन वक्त आने पर केवल वही रिश्ते और वही सम्मान काम आता है जो आपने अपने नेक व्यवहार से कमाया होता है। आज के दौर में जब समाज की प्राथमिकताएं बदल रही हैं, ऐसे में 'संस्कार' (Sanskars) और 'अनुशासन' की अहमियत और भी बढ़ जाती है। अगर नींव कमजोर हो—चाहे वह आचरण की हो या सेहत की—तो बुढ़ापा या बुरा वक्त बहुत कष्टकारी हो जाता है। जैसा कि आपने कहा, जब व्यक्ति का कर्म बिगड़ता है, तो केवल समाज ही नहीं, बल्कि अपनों का साथ भी छूटने लगता है। अंत में व्यक्ति उसी के पास सुरक्षित रहता है जिसका आचरण शुद्ध हो और जिसने दूसरों का सम्मान कमाया हो।
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