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*यह एक कहानी है और तुम्हें यह समझना चाहिए कि किसी को भी अपने कर्म सुधारने का दूसरा मौका नहीं मिलेगा। बेहतर है कि अपनी जिंदगी को सहानुभूति, दया और अपने धर्म का पालन करते हुए संतुलित करो।* *एक गाँव में रूपा नाम की एक स्त्री रहती थी। वह धन-संपत्ति से संपन्न थी, लेकिन उसके स्वभाव में दया और उदारता का अभाव था। गाँव के लोग कहते थे, “आसमान से तारे तोड़कर लाना आसान है, पर रूपा से सहायता लेना कठिन है।” यदि कोई भूखा उसके दरवाजे पर आ जाता, तो वह उसे डाँटकर भगा देती। किसी गरीब, असहाय या जरूरतमंद की मदद करना उसने कभी नहीं सीखा था।* *एक दिन गाँव की कुछ स्त्रियाँ जंगल में लकड़ियाँ लेने गईं। रूपा भी उनके साथ थी। सभी अपने-अपने कण्डों में लकड़ियाँ भर रही थीं। तभी रैजा नाम की एक स्त्री के कण्डे की डोरी अचानक टूट गई। बिना डोरी के वह लकड़ियाँ घर नहीं ले जा सकती थी।* *रूपा अपने साथ बबले घास से बनी एक अतिरिक्त डोरी लाई थी। रैजा ने विनम्रता से कहा, “बहन, मुझे यह डोरी दे दो। घर पहुँचकर मैं तुम्हें लौटा दूँगी। यदि कभी तुम्हें मेरी आवश्यकता पड़ेगी, तो मैं भी तुम्हारी सहायता करूँगी।”* *रूपा पहले तो तैयार नहीं हुई। उसे अपनी वस्तुएँ किसी को देना अच्छा नहीं लगता था। लेकिन रैजा के बार-बार आग्रह करने पर उसने अनमने मन से वह डोरी उसे दे दी। यह उसके जीवन का पहला और शायद एकमात्र अच्छा कार्य था।* *समय बीतता गया। एक दिन रूपा अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। उसकी हालत इतनी बिगड़ गई कि वह बेहोश हो गई। उसे लगा जैसे उसका सूक्ष्म शरीर उसके शरीर से निकलकर यमलोक पहुँच गया हो।* *यमलोक में पहुँचते ही उसे बहुत भूख लगी। उसने देखा कि कुछ लोग स्वादिष्ट भोजन कर रहे हैं। वह भी भोजन पाने की आशा से वहाँ गई और भोजन बाँटने वाले से बोली, “मुझे भी थोड़ा भोजन दे दीजिए।”* *वह व्यक्ति बोला, “माफ कीजिए, आपको भोजन देने की अनुमति नहीं है।”* *भूखी रूपा निराश होकर वहाँ से चली गई। रात होने लगी और ठंड बढ़ गई। उसने देखा कि कुछ लोग सुंदर बिस्तरों और रजाइयों में आराम से सो रहे हैं। वह एक सेवक के पास गई और बोली, “मेरे लिए भी सोने की व्यवस्था कर दीजिए।”* *सेवक ने जमीन की ओर इशारा करते हुए कहा, “आप यहाँ सो सकती हैं।”* *रूपा ने आश्चर्य से पूछा, “मेरे लिए पलंग, गद्दा और रजाई कहाँ है?”* *सेवक बोला, “आपको ये सब देने की अनुमति नहीं है।”* *अब रूपा बहुत दुखी हो गई। वह सीधे यमराज के पास पहुँची और बोली, “महाराज! मुझे न भोजन मिल रहा है और न सोने के लिए बिस्तर। ऐसा क्यों?”* *यमराज मुस्कराए और उसके हाथ में बबले की वही पुरानी डोरी रख दी।* *डोरी देखते ही रूपा को जंगल की वह घटना याद आ गई, जब उसने रैजा को सहायता के रूप में डोरी दी थी।* *यमराज बोले, “रूपा, पृथ्वी पर मनुष्य जो कर्म करता है, यमलोक में उसे उसी के अनुसार फल मिलता है। जिन लोगों को यहाँ स्वादिष्ट भोजन मिल रहा है, उन्होंने अपने जीवन में भूखों को भोजन कराया था। जिन्हें अच्छे बिस्तर मिले हैं, उन्होंने गरीबों को वस्त्र और बिस्तर दान किए थे।”* *फिर उन्होंने कहा, “तुमने अपने पूरे जीवन में केवल एक ही अच्छा कार्य किया था—रैजा को बबले की डोरी देना। इसलिए यहाँ तुम्हारे हिस्से में केवल यही डोरी आई है।”* *रूपा की आँखों में आँसू आ गए। उसने डोरी को बिछाकर सोने की कोशिश की, लेकिन भूख, प्यास और ठंड से पूरी रात तड़पती रही।* *सुबह वह रोती हुई यमराज के चरणों में गिर पड़ी और बोली, “महाराज! मैंने अपना जीवन व्यर्थ कर दिया। मुझे एक अवसर और दीजिए। मैं पृथ्वी पर लौटकर लोगों की सेवा करूँगी और अच्छे कर्म करूँगी।”* *यमराज को उस पर दया आ गई। उन्होंने कहा, “यदि तुम्हारे मन में सच्चा पश्चाताप है, तो तुम्हें एक अवसर दिया जाता है।”* *अगले ही क्षण रूपा का सूक्ष्म शरीर उसके मृतप्राय शरीर में लौट आया। गाँव वाले उसकी अर्थी तैयार कर रहे थे। तभी उसके शरीर में हलचल हुई और वह धीरे-धीरे उठ बैठी।* *उस दिन के बाद रूपा पूरी तरह बदल गई। उसने भूखों को भोजन कराना शुरू किया, गरीबों की सहायता की और जरूरतमंदों के दुःख दूर करने का प्रयास किया। उसके बदलते व्यवहार को देखकर पूरा गाँव आश्चर्यचकित था।* *शिक्षा: मनुष्य के अच्छे कर्म ही उसके सच्चे साथी होते हैं। धन, संपत्ति और वैभव यहीं रह जाते हैं, लेकिन दया, सेवा और परोपकार का फल हमेशा उसके साथ चलता है।

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