
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
122 days ago
*मां से बेगाना होता बेटा: शादी के बाद बदलते रिश्तों की टीस* भारतीय समाज में मां-बेटे का रिश्ता सबसे पवित्र माना जाता है। कहा जाता है कि बेटे के लिए मां पहली गुरु, पहला दोस्त और पहला सहारा होती है। जन्म से लेकर शादी तक मां हर कदम पर बेटे की परछाई बनकर साथ चलती है। लेकिन विडंबना यह है कि शादी के बाद अक्सर यही रिश्ता धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है। बेटे की जिंदगी में पत्नी के आने के बाद मां का स्थान गौण होता चला जाता है। कई घरों में यह दर्द खामोशी से मां की आंखों में उतर आता है, जिसे वह न कह पाती है न सह पाती है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह बदलाव अचानक नहीं आता, बल्कि नए रिश्तों के बीच तालमेल की कमी और बेटों की प्राथमिकताओं में बदलाव इसकी बड़ी वजह है। कुछ मां कहती हैं, "बेटे की शादी तक लगा कि मेरी दुनिया पूरी है। बारात में सबसे आगे मैं ही थी। पर बहू के आने के छह महीने बाद ही बेटा फैसले मुझसे पूछकर नहीं, पत्नी से सलाह लेकर लेने लगा। अब तो बात भी हफ्ते में एक बार होती है।" मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, शादी के बाद बेटे पर दोहरी जिम्मेदारी आ जाती है। एक तरफ वह पति के रूप में नई गृहस्थी बसाता है, दूसरी तरफ बेटे का फर्ज निभाने का दबाव भी रहता है। कई बार पत्नी और मां के बीच संतुलन न बना पाने के कारण बेटा अनजाने में मां से दूरी बना लेता है। छोटे शहरों से महानगरों में नौकरी के लिए जाने वाले बेटों के केस में यह समस्या और गंभीर हो जाती है। मां गांव या पुराने घर में अकेली रह जाती है, जबकि बेटा-बहू शहर में अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाते हैं। जानकार बताते हैं, "हमारे यहां संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। पहले बहू सास के साथ रहकर रिश्ते समझती थी। अब न्यूक्लियर फैमिली में पति-पत्नी की अपनी प्राइवेसी है। बेटा उसी में उलझकर रह जाता है और मां को लगता है कि उसे दूर कर दिया गया। यह दूरी जानबूझकर कम, हालात की वजह से ज्यादा बनती है।" कुछ मामलों में संपत्ति विवाद या बहू-सास की अनबन भी इस दूरी की वजह बनती है, पर अधिकांश मांएं सिर्फ इतना चाहती हैं कि बेटा पहले की तरह उनके पास दो पल बैठे, हाल पूछे। इस सामाजिक दर्द का हल सिर्फ बेटों के हाथ में है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि शादी के बाद बेटों को सचेत होकर मां को यह एहसास दिलाना चाहिए कि पत्नी के आने से मां की अहमियत कम नहीं हुई है। छोटे-छोटे काम, जैसे रोज फोन करना, छुट्टी में मां के पास समय बिताना, फैसलों में मां की राय लेना, इस खाई को पाट सकते हैं। पत्नी की भी भूमिका अहम है। अगर वह सास को मां की तरह सम्मान दे तो बेटा भी बीच में संतुलन बना पाएगा। वहीं कुछ लोगों का यह मानना हैं, "पति अगर मां को समय दें तो अच्छा लगता है। रिश्ते बांटने से नहीं, जोड़ने से बढ़ते हैं।" जरूरत है कि बेटे याद रखें कि पत्नी जीवनसाथी है, पर मां जीवनदाता। एक के आने से दूसरे को भुला देना किसी रिश्ते के साथ न्याय नहीं। समाज तभी मजबूत होगा जब बेटा शादी के बाद भी मां का वही 'छोटा बच्चा' बना रहे, जिसके लिए मां ने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी। मां का दर्द आंसुओं में न बहे, इसके लिए संवाद, समय और सम्मान तीनों जरूरी हैं। - ए के गिरि।

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