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अगर कोई बच्चा भगवान को अपना सखा बना ले… रोज उनसे बातें करे… तो क्या भगवान सच में जवाब देते हैं? यह कथा है एक निर्धन बालक शिवदत्त की… जिसने भगवान जगन्नाथ को अपना सबसे सच्चा दोस्त बना लिया… और फिर हुआ ऐसा चमत्कार कि पूरा गांव दंग रह गया। उड़ीसा के एक छोटे से गांव में, जहां ना बिजली थी ना पक्की सड़कें… वहीं एक कच्चे घर में जन्मा था शिवदत्त। एक गरीब ब्राह्मण का बेटा… जिसके पास खिलौनों की जगह संघर्ष था। जब वह सिर्फ 7 साल का था, तभी उसके पिता का देहांत हो गया। मां ने मेहनत करके उसे पाला… लेकिन इस बच्चे का मन दुनिया में नहीं लगता था। उसके आंगन के कोने में मिट्टी का एक छोटा सा मंदिर था… और वहीं उसका पूरा संसार बसता था। हर सुबह वह स्नान करके बैठता… दीपक जलाता… और फिर भगवान से ऐसे बातें करता जैसे कोई अपने सबसे प्यारे दोस्त से करता है। “प्रभु… आज मां बहुत थक गई है… आप उन्हें सपने में मिलकर मुस्कुरा देना…” “प्रभु… आज मेरे पास कुछ नहीं है… ये रोटी मैंने आपके लिए बचाई है…” गांव वाले उसका मजाक उड़ाते… बच्चे उसे पागल कहते… कोई पत्थर फेंकता… कोई हंसता… लेकिन शिवदत्त हर बार मुस्कुरा देता और कहता— “एक दिन मेरे प्रभु जरूर बोलेंगे… क्योंकि मैंने उन्हें पूजा नहीं, प्रेम किया है।” धीरे-धीरे उसका मन पूरी तरह भगवान में डूब गया। वह ना खेलता… ना घूमता… बस हर समय अपने प्रभु के साथ बिताता। उसके और भगवान के बीच एक ऐसा रिश्ता बन गया जिसे कोई देख नहीं सकता था… पर वह हर पल उसे महसूस करता था। जब मां बीमार होती… तो वह मंदिर के सामने बैठकर कहता— “प्रभु… आज मां को ठीक कर देना…” कभी वह चिट्ठियां लिखता… कभी खिलौने चढ़ाता… कभी रूठता… कभी मनाता… और हर रात एक ही बात कहकर सोता— “प्रभु… सपने में जरूर आना…” एक दिन गांव के लोगों ने उसे घेर लिया। मुखिया ने पूछा— “क्या भगवान तेरे दोस्त हैं?” शिवदत्त ने मुस्कुराकर कहा— “हां… वो मेरे दोस्त हैं… आप उन्हें पत्थर कहते हैं… पर वो मेरे लिए सब कुछ हैं।” लोग और हंसे… लेकिन उसका विश्वास नहीं डगमगाया। एक रात… जब सब सो गए थे… शिवदत्त मंदिर में बैठा था। उसके हाथ में सूखी रोटी थी… उसने उसे भगवान के सामने रखा और आंखें बंद कर लीं। फिर बोला— “प्रभु… आज मैं आपसे तीन सवाल पूछूंगा…” पहला… “क्या आप मेरी बातें सुनते हैं?” दूसरा… “क्या आप मेरे साथ चलते हैं?” तीसरा… “क्या आप मुझसे प्रेम करते हैं?” यह कहकर वह वहीं लेट गया… भूखा… आंखों में आंसू… पर दिल में पूरा विश्वास। उस रात कुछ बदला… कोई तेज प्रकाश नहीं… कोई आवाज नहीं… बस एक कोमल एहसास… जैसे किसी ने उसके सिर पर हाथ फेरा हो। सुबह जब उसकी आंख खुली… तो उसके सामने एक पीला सा कागज रखा था। उस पर लिखा था— “तेरे हर आंसू का हिसाब है मेरे पास… तू जो कहता है… मैं सब सुनता हूं…” उसने नीचे देखा… मिट्टी में दो जोड़ी पैरों के निशान थे… एक उसके… और एक उसके साथ-साथ चलने वाले। पत्र में लिखा था— “मैं तेरे साथ चलता हूं… हर रास्ते पर…” शिवदत्त की आंखों से आंसू बहने लगे… लेकिन इस बार वो खुशी के थे। फिर उसने देखा… उसका छोटा सा खिलौना भगवान के पास रखा हुआ था… जैसे किसी ने उसे प्रेम से स्वीकार किया हो… और एक पंक्ति और लिखी थी— “मैं तुझसे प्रेम करता हूं… क्योंकि तू मुझसे सच्चा प्रेम करता है…” उस दिन के बाद शिवदत्त बदल गया। अब उसे किसी प्रमाण की जरूरत नहीं थी। उसे पता चल चुका था— भगवान जवाब देते हैं… लेकिन शब्दों में नहीं… एहसास में। वह अपनी मां के पास गया और बोला— “मां… भगवान मेरे सखा हैं… वो हमेशा मेरे साथ हैं…” धीरे-धीरे उसकी मां भी ठीक होने लगी… और गांव वाले भी समझ गए कि यह बच्चा पागल नहीं… सच्चा भक्त है। शिवदत्त की कहानी हमें यही सिखाती है— जब भक्ति सच्ची होती है… तो भगवान दूर नहीं रहते। जब विश्वास अटूट होता है… तो जवाब जरूर मिलता है। और जब प्रेम निस्वार्थ होता है… तो ईश्वर भी सखा बन जाते हैं। जय जगन्नाथ 🙏

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