
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
178 days ago
जो भी श्री नारायण की शरण में आया उसका भार स्वयं श्री नारायण ने उठाया यह विचार अत्यंत गहरा और भक्ति मार्ग का सार है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने यही आश्वासन दिया है: > सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज | > अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: || > इसका अर्थ है कि जब मनुष्य अपने अहंकार और चिंताओं को त्यागकर पूर्णतः परमात्मा के चरणों में समर्पित हो जाता है, तो उसके जीवन की जिम्मेदारी स्वयं भगवान की हो जाती है। इस समर्पण के कुछ मुख्य पक्ष: * निश्चिंतता: जो शरण में आता है, वह फल की चिंता छोड़ देता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि "हरि" जो करेंगे, मंगल ही करेंगे। * अहंकार का त्याग: 'मैं कर रहा हूँ' के भाव को छोड़कर 'वे करा रहे हैं' का भाव आना ही सच्ची शरणागति है। * योगक्षेमं वहाम्यहम्: भगवान स्वयं कहते हैं कि जो अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हैं, उनके योग (जो उनके पास नहीं है उसे सुलभ कराना) और क्षेम (जो उनके पास है उसकी रक्षा करना) का वहन मैं स्वयं करता हूँ। भक्ति और अध्यात्म की यह धारा जीवन में असीम शांति और संबल प्रदान करती है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏 शुभप्रभात जी 🙏

Comments (4)

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
Mar 5, 2026
जय श्री राधे कृष्णा जी

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
Mar 5, 2026
शुभप्रभात बेहन जी 🙏

Saumya Sharma
Mar 5, 2026
सही बात है 👌 बहुत ही सुन्दर लेख के साथ बहुत ही सुन्दर पोस्ट 👌 है भाई आपकी 🙏 धन्यवाद 🙏 सुप्रभात वंदन 🙏🌹☺️

vijay kushwaha
Mar 5, 2026
जय श्री राधे कृष्ण
