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**कुल्लू दशहरा** हिमाचल प्रदेश का एक अत्यंत प्रसिद्ध, ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त उत्सव है। यह पर्व दुनिया के अन्य हिस्सों में मनाए जाने वाले विजय दशमी (रावण दहन) से अलग, अपनी अनूठी संस्कृति, परंपराओं और भव्यता के लिए जाना जाता है। कुल्लू दशहरा के इतिहास, इसकी शुरुआत और इसके धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी निम्नलिखित है: ### 1. कुल्लू दशहरा का इतिहास और उत्पत्ति कुल्लू दशहरा की शुरुआत लगभग **17वीं शताब्दी** में हुई थी। इसके इतिहास से जुड़ी मुख्य कथा राजा जगत सिंह और भगवान रघुनाथ (श्री राम) से जुड़ी है: * **राजा जगत सिंह का शासन:** 17वीं शताब्दी के मध्य में राजा जगत सिंह कुल्लू रियासत के शासक थे। कहा जाता है कि उनके शासनकाल में मणिकर्ण घाटी के टिप्परी गांव में एक गरीब ब्राह्मण (दुर्गा दत्त) के पास बहुमूल्य मोती होने की अफवाह फैली। * **घटना का मोड़:** राजा के अधिकारियों ने जबरन उस ब्राह्मण से मोती मांगने शुरू कर दिए। प्रताड़ना से तंग आकर उस ब्राह्मण ने अपने पूरे परिवार को आग में झोंककर आत्महत्या कर ली और राजा को शाप दिया कि जो मोती वह मांग रहा है, उसे अब उसके खून और आंसुओं के रूप में देखना पड़ेगा। * **शाप का निवारण:** ब्राह्मण के शाप के प्रभाव से राजा जगत सिंह को कुष्ठ रोग (कोढ़) हो गया और उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। ऋषि-मुनियों के कहने पर राजा ने प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। * **अयोध्या से भगवान रघुनाथ की मूर्ति का आना:** संतों की सलाह पर राजा के एक दरबारी (पंथ राम) अयोध्या गए और वहां से भगवान श्रीराम (रघुनाथ जी) की एक भव्य मूर्ति लेकर आए। सन **1651 में आषाढ़ शुक्ल एकादशी** के दिन राजा ने इस मूर्ति को अपने राज्य की गद्दी पर स्थापित किया। * **राजा द्वारा राज्य का समर्पण:** भगवान रघुनाथ की स्थापना के बाद, राजा जगत सिंह ने अपना सारा राज्य और मुकुट भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया और खुद उनके सेवक के रूप में शासन चलाने लगे। इसके बाद से राजा जगत सिंह को भगवान रघुनाथ का मुख्य सेवक माना जाता है, और कुल्लू के दशहरा उत्सव की शुरुआत हुई। ### 2. उत्सव का समय और अनूठा स्वरूप * **शुरुआत:** देश भर में जहां विजया दशमी (दशहरा) के दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं, वहीं कुल्लू में दशहरा उत्सव **विजया दशमी के दिन से ही शुरू** होता है और लगातार 7 दिनों तक चलता है। * **अंतरराष्ट्रीय पहचान:** 1972 में इसे भारत सरकार द्वारा 'अंतरराष्ट्रीय उत्सव' (International Festival) का दर्जा दिया गया था। हर साल ढालपुर मैदान में देश-विदेश से लाखों पर्यटक इस ऐतिहासिक उत्सव को देखने आते हैं। ### 3. प्रमुख विशेषताएं और परंपराएं कुल्लू दशहरा केवल एक मेला नहीं, बल्कि देवताओं का एक विशाल महाकुंभ है: * **देवी-देवताओं का मिलन:** इस उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कुल्लू घाटी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से **सैकड़ों देवी-देवता (लगभग 250 से अधिक)** अपने-अपने रथों, ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ धालपुर मैदान में पहुंचते हैं। यह सभी देवता भगवान रघुनाथ के दरबार में अपनी हाजिरी लगाते हैं। * **भव्य रथ यात्रा (रथ यात्रा):** उत्सव के पहले दिन भगवान रघुनाथ की भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है। हजारों भक्त पारंपरिक वेशभूषा में सजे इस रथ को रस्सियों से खींचते हैं। इस रथ को खींचना बहुत ही पवित्र माना जाता है। * **सांस्कृतिक प्रस्तुतियां:** इस एक हफ्ते के दौरान कुल्लू के ऐतिहासिक धालपुर मैदान में पहाड़ी लोक नृत्य (नाटी), सांस्कृतिक संध्याएं और पारंपरिक खेलों का आयोजन होता है, जिसमें देश-विदेश के कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। * **लंका दहन और समापन:** उत्सव के सातवें दिन ब्यास नदी के तट पर 'लंका दहन' का प्रतीकात्मक कार्यक्रम होता है। इसके बाद भगवान रघुनाथ की मूर्ति को वापस उनके मुख्य मंदिर (रघुनाथपुर) में पूरे सम्मान के साथ पहुंचा दिया जाता है, जिसके साथ ही यह उत्सव संपन्न होता है। कुल्लू दशहरा हिमाचल प्रदेश की समृद्ध संस्कृति, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक परंपराओं का सबसे बड़ा जीवंत प्रतीक है।

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