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प्रेमानंद महाराज जी के प्रवचनों में 'नाम जप' को साधना का केंद्र माना गया है। वे इसे केवल एक आध्यात्मिक क्रिया नहीं, बल्कि जीवन जीने का आधार बताते हैं। उनके अनुसार नाम जप की महिमा के कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं: 1. "नाम" और "नामी" में अभेद महाराज जी बार-बार यह स्पष्ट करते हैं कि भगवान और उनके नाम में कोई अंतर नहीं है। जब आप नाम जपते हैं, तो साक्षात् प्रभु आपके साथ होते हैं। वे कहते हैं कि जैसे ही आप 'नाम' लेते हैं, प्रभु आपके हृदय में विराजमान हो जाते हैं। 2. निरंतरता (अखंड जप) उनका सबसे अधिक जोर इस बात पर रहता है कि जप केवल माला तक सीमित न रहे। वे 'स्वास-स्वास' पर नाम जप की प्रेरणा देते हैं। यानी खाते-पीते, चलते-फिरते या कार्य करते समय भी मानसिक रूप से नाम चलता रहना चाहिए। 3. पापों का नाश और बुद्धि की शुद्धि महाराज जी का मानना है कि मनुष्य के भीतर के विकार (काम, क्रोध, लोभ, मोह) केवल नाम की अग्नि से ही जल सकते हैं। जब बुद्धि शुद्ध होती है, तभी व्यक्ति सही मार्ग चुन पाता है और सांसारिक दुखों से ऊपर उठ जाता है। 4. विपरीत परिस्थितियों में कवच वे अक्सर कहते हैं कि जब जीवन में घोर संकट आए, तो नाम जप ही वह ढाल है जो आपको टूटने नहीं देगी। नाम की शक्ति प्रारब्ध (किस्मत) के कठिन लेख को भी सहने योग्य बना देती है। 5. शरणागति का भाव उनके अनुसार, नाम जप तब सबसे प्रभावी होता है जब वह पूर्ण शरणागति के साथ किया जाए। "मैं आपका हूँ और आप मेरे हैं"—इस भाव से किया गया जप भक्त को सीधे ईश्वर से जोड़ देता है। महाराज जी के अनुसार जप की विधि: * जीभ से जप: शुरुआत में बोलकर या फुसफुसाकर करें। * मानसिक जप: धीरे-धीरे इसे मन के भीतर ले जाएं। * बिना रुके: अभ्यास ऐसा हो कि सोते समय भी हृदय में नाम की ध्वनि गूंजती रहे। > महाराज जी का मूल मंत्र: "नाम जपते रहो, बस यही एक सार है।" > राधे राधे जी

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