
SHREE SHARMA
432 days ago
किं निर्मिता मुकुटचन्द्रकलां निपीड्य किं वा शिर:शरणनिर्झरिणीजलेन । किं वा करस्थकलशामृतसंप्लवेन भक्तिस्त्वया प्रणयिनां भवतापशान्त्यै ॥ हे परमकरुणामय प्रभु ! भला, आप यह तो वतलाइये कि क्या आपने अपने शरणागतोंके सांसारिक पाप-तापोंकी निवृत्तिके लिए अपने मुकुटकी चन्द्रकलाको निचोड़कर उसके सार-स्वरूपअमृतमय तत्त्वसे अपनी इस भक्तिका निर्माण किया है ? अथवा, अपने मस्तकपर वैठी पतित-पावनी देवगङ्गाकी सुशीतल जलधारासे इसका निर्माण किया है ? अथवा आपके करकमलस्थ कलशके अमृतसे इसका निमोण किया है ? क्योंकि यदि आपके प्रति भक्ति इन बस्तुओंसे न बनी होती, तो फिर जीवोंके पाप-तापोंको मिटाकर हृदयमें परम आनन्द कैसे प्रदान करती है ? 🌸🌸🌸🌸🌸 ॐ नम: शिवाय 🌸🌸🌸🌸🌸

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