
SHREE SHARMA
20 days ago
नवग्रहों के स्वरूप, उनकी समिधाओं (हवन की समिधाएँ), नवग्रह-होम की विस्तृत विधि और ग्रह-दोष निवारण के दान और मंत्र: सनन्दन जी ने बताया कि नौ ग्रह (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु) मनुष्य के कर्मानुसार उसे फल देते हैं। जब कोई ग्रह प्रतिकूल होकर रोग, कष्ट या धन-हानि देता है, तो उसकी विशेष समिधा से हवन करने पर वह शांत और प्रसन्न हो जाता है: सूर्य : अर्क (मदार) की समिधा — आरोग्यता और ओज हेतु। चंद्रमा : पलाश (ढाक) की समिधा — मानसिक शांति और बुद्धि हेतु। मंगल खदिर (खैर) की समिधा — भूमि, शक्ति और ऋण-मुक्ति हेतु। बुध अपामार्ग (अपामार्ग/लटजीरा) की समिधा — ज्ञान, वाणी और व्यापार हेतु। गुरु : पीपल (अश्वत्थ) की समिधा — विद्या, धर्म और संतति हेतु। शुक्र : गूलर (उदुंबर) की समिधा — संपत्ति, वाहन और वैभव हेतु। शनिवार/शनि : शमी (छोंकर) की समिधा — आयु और संकट-मुक्ति हेतु। राहु : दूर्वा (दूब घास) की समिधा — बाधा-निवारण और मानसिक भय हेतु। केतु : कुशा (कुश) की समिधा — मोक्ष और अध्यात्म-सिद्धि हेतु। महर्षि सनन्दन जी ने नवग्रह मण्डल के पूजन और हवन का नियम समझाया: मण्डल-निर्माण: शुभ मुहूर्त में वेदी बनाकर उस पर चावल, तिल और रंगों से नवग्रहों का गोल/चौकोर मण्डल बनाया जाता है। आवाहन व स्थापन: मध्य में सूर्य, पूर्व-दक्षिण में मंगल, दक्षिण में शुक्र, उत्तर-पूर्व (ईशान) में गुरु, उत्तर में बुध, पूर्व में चंद्रमा, पश्चिम में शनि, दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) में राहु और उत्तर-पश्चिम (वायव्य) में केतु की स्थापना की जाती है। आहुति-संख्या: प्रत्येक ग्रह के वैदिक या पौराणिक मंत्रों से १०८, १०८० या उससे अधिक आहुतियाँ दी जाती हैं। आहुति के बाद घृत (घी) और चरु का होम किया जाता है। सनन्दन जी ने बताया कि केवल हवन ही नहीं, बल्कि विशिष्ट वस्तुओं का दान करने से भी ग्रहों के अनिष्ट प्रभाव तुरंत समाप्त हो जाते हैं: सूर्य के लिए: माणिक्य (रुबी), ताँबा, गुड़, और लाल वस्त्र का दान। चंद्रमा के लिए: मोती, चाँदी, दूध, और श्वेत वस्त्र का दान। मंगल के लिए: मूंगा, लाल मसूर, और ताँबे का पात्र। बुध के लिए: पन्ना, कांस्य (कांसा), और हरी मूंग। गुरु के लिए: पुखराज, चना दाल, हल्दी, और पीला वस्त्र। शुक्र के लिए: हीरा, चावल, इत्र, और उजला वस्त्र। शनि के लिए: नीलम, काला तिल, उड़द दाल, और लोहे का दान। राहु व केतु के लिए: गोमेद व लहसुनिया, और कस्तूरी व सात प्रकार का अनाज (सप्तधान्य)। !!जय श्री कृष्ण!!

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